इतना मजबूर न कर बात बनाने लग जाए
हम तेरे सर की क़सम झूठ ही खाने लग जाए
इतने सन्नाटे पिए मेरी समा'अत ने कि अब
सिर्फ़ आवाज़ पे चाहूँ तो निशाने लग जाए
मैं अगर अपनी जवानी के सुना दूँ क़िस्से
ये जो लौंडे हैं मेरे पाँव दबाने लग जाए
क्यूँ डरें ज़िन्दगी में क्या होगा
कुछ न होगा तो तजरबा होगा
हँसती आँखों में झाँक कर देखो
कोई आँसू कहीं छुपा होगा
इन दिनों ना-उमीद सा हूँ मैं
शायद उसने भी ये सुना होगा
देखकर तुमको सोचता हूँ मैं
क्या किसी ने तुम्हें छुआ होगा
तेरी मुश्किल न बढ़ाऊॅंगा चला जाऊॅंगा
अश्क आँखों में छुपाऊॅंगा चला जाऊॅंगा
अपनी दहलीज़ पे कुछ देर पड़ा रहने दे
जैसे ही होश में आऊॅंगा चला जाऊॅंगा
ख़्वाब लेने कोई आए कि न आए कोई
मैं तो आवाज़ लगाऊॅंगा चला जाऊॅंगा
चंद यादें मुझे बच्चों की तरह प्यारी हैं
उनको सीने से लगाऊँगा चला जाऊँगा
मुद्दतों बाद मैं आया हूँ पुराने घर में
ख़ुद को जी भर के रुलाऊँगा चला जाऊँगा
इस जज़ीरे में ज़ियादा नहीं रहना अब तो
आजकल नाव बनाऊँगा चला जाऊँगा
मौसम-ए-गुल की तरह लौट के आऊँगा 'हसन'
हर तरफ़ फूल खिलाऊँगा चला जाऊँगा
ये ग़म क्या दिल की 'आदत है नहीं तो
किसी से कुछ शिकायत है नहीं तो
है वो इक ख़्वाब-ए-बे-ताबीर उस को
भुला देने की नीयत है नहीं तो
किसी के बिन किसी की याद के बिन
जिए जाने की हिम्मत है नहीं तो
किसी सूरत भी दिल लगता नहीं हाँ
तो कुछ दिन से ये हालत है नहीं तो
तेरे इस हाल पर है सब को हैरत
तुझे भी इस पे हैरत है नहीं तो
हम-आहंगी नहीं दुनिया से तेरी
तुझे इस पर नदामत है नहीं तो
हुआ जो कुछ यही मक़्सूम था क्या
यही सारी हिकायत है नहीं तो
अज़िय्यत-नाक उम्मीदों से तुझको
अमाँ पाने की हसरत है नहीं तो
तू रहता है ख़याल-ओ-ख़्वाब में गुम
तो इसकी वज्ह फ़ुर्सत है नहीं तो
सबब जो इस जुदाई का बना है
वो मुझसे ख़ूबसूरत है नहीं तो
चाँद सितारे फूल परिंदे शाम सवेरा एक तरफ़
सारी दुनिया उसका चर्बा उसका चेहरा एक तरफ़
वो लड़कर भी सो जाए तो उसका माथा चूमूँ मैं
उससे मुहब्बत एक तरफ़ है उससे झगड़ा एक तरफ़
जिस शय पर वो उँगली रख दे उसको वो दिलवानी है
उसकी ख़ुशियाँ सब से अव्वल सस्ता महँगा एक तरफ़
ज़ख़्मों पर मरहम लगवाओ लेकिन उसके हाथों से
चारासाज़ी एक तरफ़ है उसका छूना एक तरफ़
सारी दुनिया जो भी बोले सब कुछ शोर शराबा है
सब का कहना एक तरफ़ है उसका कहना एक तरफ़
उसने सारी दुनिया माँगी मैंने उसको माँगा है
उसके सपने एक तरफ़ है मेरा सपना एक तरफ़
यही अपनी कहानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
वह लड़की जाँ हमारी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
वहम मुझको ये भाता है,अभी मेरी दिवानी है
मगर मेरी दिवानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
रक़ीब आकर बताते हैं यहाँ तिल है, वहाँ तिल है
हमें ये जानकारी थी मियाँ पहले, बहुत पहले
अदब से मांग कर माफ़ी भरी महफ़िल ये कहता हूँ
वो लड़की ख़ानदानी थी, मियाँ पहले बहुत पहले
उसी जगह पर जहाँ कई रास्ते मिलेंगे
पलट के आए तो सबसे पहले तुझे मिलेंगे
अगर कभी तेरे नाम पर जंग हो गई तो
हम ऐसे बुज़दिल भी पहली सफ़ में खड़े मिलेंगे
तुझे ये सड़कें मेरे तवस्सुत से जानती हैं
तुझे हमेशा ये सब इशारे खुले मिलेंगे
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो
तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और इतने ही बेमुरव्वत हो
किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मेरी ज़िन्दगी की आदत हो
किसलिए देखते हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूबसूरत हो
दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मेरी आख़िरी मुहब्बत हो
मेरे बस में नहीं वरना कुदरत का लिखा हुआ काटता
तेरे हिस्से में आए बुरे दिन कोई दूसरा काटता
लारियों से ज्यादा बहाव था तेरे हर इक लफ्ज़ में
मैं इशारा नहीं काट सकता तेरी बात क्या काटता
मैंने भी ज़िंदगी और शब ए हिज़्र काटी है सबकी तरह
वैसे बेहतर तो ये था के मैं कम से कम कुछ नया काटता
तेरे होते हुए मोमबत्ती बुझाई किसी और ने
क्या ख़ुशी रह गयी थी जन्मदिन की, मैं केक क्या काटता
कोई भी तो नहीं जो मेरे भूखे रहने पे नाराज़ हो
जेल में तेरी तस्वीर होती तो हंसकर सज़ा काटता
वो बेवफ़ा है तो क्या मत कहो बुरा उसको
कि जो हुआ सो हुआ ख़ुश रखे ख़ुदा उसको
नज़र न आए तो उसकी तलाश में रहना
कहीं मिले तो पलट कर न देखना उसको
वो सादा ख़ूँ था ज़माने के ख़म समझता क्या
हवा के साथ चला ले उड़ी हवा उसको
वो अपने बारे में कितना है ख़ुश-ग़ुमाँ देखो
जब उसको मैं भी न देखूँ तो देखना उसको
कैसे उसने ये सब कुछ मुझसे छुपकर बदला
चेहरा बदला रस्ता बदला बाद में घर बदला
मैं उसके बारे में ये कहता था लोगों से
मेरा नाम बदल देना वो शख़्स अगर बदला
वो भी ख़ुश था उसने दिल देकर दिल माँगा है
मैं भी ख़ुश हूँ मैंने पत्थर से पत्थर बदला
मैंने कहा क्या मेरी ख़ातिर ख़ुद को बदलोगे
और फिर उसने नज़रें बदलीं और नंबर बदला
ख़ामोश लब हैं झुकी हैं पलकें, दिलों में उल्फ़त नई नई है
अभी तक़ल्लुफ़ है गुफ़्तगू में, अभी मोहब्बत नई नई है
अभी न आएँगी नींद तुमको, अभी न हमको सुकूँ मिलेगा
अभी तो धड़केगा दिल ज़ियादा, अभी मुहब्बत नई नई है
बहार का आज पहला दिन है, चलो चमन में टहल के आएँ
फ़ज़ा में ख़ुशबू नई नई है गुलों में रंगत नई नई है
जो खानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना
तुम्हारा लहजा बता रहा है, तुम्हारी दौलत नई नई है
ज़रा सा क़ुदरत ने क्या नवाज़ा के आके बैठे हो पहली सफ़ में
अभी क्यों उड़ने लगे हवा में अभी तो शोहरत नई नई है
बमों की बरसात हो रही है, पुराने जांबाज़ सो रहे हैं
ग़ुलाम दुनिया को कर रहा है वो जिसकी ताक़त नई नई है
मैंने जो कुछ भी सोचा हुआ है, मैं वो वक़्त आने पे कर जाऊँगा
तुम मुझे ज़हर लगते हो और मैं किसी दिन तुम्हें पी के मर जाऊँगा
तू तो बीनाई है मेरी तेरे अलावा मुझे कुछ भी दिखता नहीं
मैंने तुझको अगर तेरे घर पे उतारा तो मैं कैसे घर जाऊँगा
चाहता हूँ तुम्हें और बहुत चाहता हूँ, तुम्हें ख़ुद भी मालूम है
हाँ अगर मुझसे पूछा किसी ने तो मैं सीधा मुँह पर मुकर जाऊँगा
तेरे दिल से तेरे शहर से तेरे घर से तेरी आँख से तेरे दर से
तेरी गलियों से तेरे वतन से निकाला हुआ हूँ किधर जाऊँगा
अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें
ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें
तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें
आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें
अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
उसूलों पर जहाँ आँच आए टकराना ज़रूरी है
जो ज़िंदा हो तो फिर ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है
नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है
थके हारे परिन्दे जब बसेरे के लिये लौटें
सलीक़ामन्द शाख़ों का लचक जाना ज़रूरी है
बहुत बेबाक आँखों में त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मुहब्बत में कशिश रखने को शर्माना ज़रूरी है
सलीक़ा ही नहीं शायद उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है तो नज़र आना ज़रूरी है
मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
ये मैंने कब कहा कि मेरे हक़ में फ़ैसला करे
अगर वो मुझ से ख़ुश नहीं है तो मुझे जुदा करे
मैं उसके साथ जिस तरह गुज़ारता हूँ ज़िंदगी
उसे तो चाहिए कि मेरा शुक्रिया अदा करे
मेरी दुआ है और इक तरह से बद्दुआ भी है
ख़ुदा तुम्हें तुम्हारे जैसी बेटियाँ अता करे
बना चुका हूँ मैं मोहब्बतों के दर्द की दवा
अगर किसी को चाहिए तो मुझसे राब्ता करे
सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं
सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं
सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं
सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़
सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं
सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं
सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं
सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं
सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं
सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं
सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं
सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं
सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की
जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं
सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में
मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं
सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं
सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं
वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं
बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं
सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं
रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं
किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं
कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं
अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
आईने आंख में चुभते थे बिस्तर से बदन कतराता था
एक याद बसर करती थी मुझे मै सांस नहीं ले पाता था
एक शख्स के हाथ में था सब कुछ मेरा खिलना भी मुरझाना भी
रोता था तो रात उजड़ जाती हंसता था तो दिन बन जाता था
मै रब से राब्ते में रहता मुमकिन है की उस से राब्ता हो
मुझे हाथ उठाना पड़ते थे तब जाकर वो फोन उठाता था
मुझे आज भी याद है बचपन में कभी उस पर नजर अगर पड़ती
मेरे बस्ते से फूल बरसते थे मेरी तख्ती पे दिल बन जाता था
हम एक ज़िंदान में जिंदा थे हम एक जंजीर में बढ़े हुए
एक दूसरे को देख कर हम कभी हंसते थे तो रोना आता था
वो जिस्म नजरअंदाज नहीं हो पाता था इन आंखों से
मुजरिम ठहराता था अपना कहने को तो घर ठहराता था
थोड़ा लिक्खा और ज़ियादा छोड़ दिया
आने वालों के लिए रस्ता छोड़ दिया
तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री
तुमने तो बस पानी भरना छोड़ दिया
लड़कियाँ इश्क़ में कितनी पागल होती हैं
फ़ोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया
रोज़ इक पत्ता मुझ में आ गिरता है
जब से मैंने जंगल जाना छोड़ दिया
बस कानों पर हाथ रखे थे थोड़ी देर
और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिए
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे
तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव
मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे
तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है?
जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे