@jaun-elia
Explore the poetic brilliance of renowned Pakistani poet Jaun Elia, featuring a diverse collection of sher, ghazal, and nazm in both Hindi and English. Delve into his genius and save your cherished verses.
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जो रानाई निगाहों के लिए सामान-ए-जल्वा है
लिबास-ए-मुफ़्लिसी में कितनी बे-क़ीमत नज़र आती
यहाँ तो जाज़बिय्यत भी है दौलत ही की पर्वर्दा
ये लड़की फ़ाक़ा-कश होती तो बद-सूरत नज़र आती
वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था
आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे
अपने अंदर हँसता हूँ मैं और बहुत शरमाता हूँ
ख़ून भी थूका सच-मुच थूका और ये सब चालाकी थी
अहद-ए-रफ़ाक़त ठीक है लेकिन मुझ को ऐसा लगता है
तुम तो मेरे साथ रहोगी मैं तन्हा रह जाऊँगा
अब जो रिश्तों में बँधा हूँ तो खुला है मुझ पर
कब परिंद उड़ नहीं पाते हैं परों के होते
कौन सूद-ओ-ज़ियाँ की दुनिया में
दर्द ग़ुर्बत का साथ देता है
जब मुक़ाबिल हों इश्क़ और दौलत
हुस्न दौलत का साथ देता है
मर चुका है दिल मगर ज़िंदा हूँ मैं
ज़हर जैसी कुछ दवाएँ चाहिए
पूछते हैं आप आप अच्छे तो हैं
जी मैं अच्छा हूँ दुआएँ चाहिए
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
बात ही कब किसी की मानी है
अपनी हठ पूरी कर के छोड़ोगी
ये कलाई ये जिस्म और ये कमर
तुम सुराही ज़रूर तोड़ोगी