मैं न सोया रात सारी तुम कहो
बिन मेरे कैसे गुज़ारी, तुम कहो
हिज्र, आँसू, दर्द, आहें, शायरी
ये तो बातें थीं हमारी, तुम कहो
दुनिया की फ़िक्र छोड़, न यूँ अब उदास बैठ
ये वक़्त रब की देन है, अम्मी के पास बैठ
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया
है दुख तो कह दो किसी पेड़ से परिंदे से
अब आदमी का भरोसा नहीं है प्यारे कोई
तू भी कब मेरे मुताबिक मुझे दुख दे पाया
किस ने भरना था ये पैमाना अगर खाली था
एक दुख ये कि तू मिलने नही आया मुझसे
एक दुख ये है उस दिन मेरा घर खाली था
आँख आँसू को ऐसे रस्ता देती है
जैसे रेत गुज़रने दरिया देती है
कोई भी उसको जीत नहीं पाया अब तक
वैसे वो हर एक को मौक़ा देती है
मैं वो नाकाम मुसव्विर हूँ जो ख़ुद के हाथों
एक उदासी के सिवा कुछ न बना पाया है
यूँ ही थोड़ी मेरी गज़लों में इतना दुख होता है
इस दुनिया ने हम लड़कों से रोने का हक़ छीना है
नाप रहा था एक उदासी की गहराई
हाथ पकड़कर वापस लायी है तन्हाई
वस्ल दिनों को काफ़ी छोटा कर देता है
हिज्र बढ़ा देता है रातों की लम्बाई
मैं तो उस वक़्त से डरता हूँ कि वो पूछ न ले
ये अगर ज़ब्त का आँसू है तो टपका कैसे
दश्त छोड़े हुए अब तो अरसा हुआ
मैं हूँ मजनूँ मगर नाम बदला हुआ
मुझको औरत के दुख भी पता हैं कि मैं
एक लड़का हूँ बेवा का पाला हुआ
कहा जो कृष्ण ने गीता में रक्खेगा अगर तू याद
भले जितना घना जंगल हो पर तू खो नहीं सकता