Abrar Kashif

Abrar Kashif

@abrar-kashif

Abrar Kashif shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Abrar Kashif's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal
  • Nazm

सितारे और क़िस्मत देख कर घर से निकलते हैं
जो बुज़दिल हैं मुहूरत देखकर घर से निकलते हैं

हमें लेकिन सफ़र की मुश्किलों से डर नहीं लगता
कि हम बच्चों की सूरत देखकर घर से निकलते हैं

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दिया जला के सभी बाम-ओ-दर में रखते हैं
और एक हम हैं इसे रह-गुज़र में रखते हैं

समुंदरों को भी मालूम है हमारा मिज़ाज
कि हम तो पहला क़दम ही भँवर में रखते हैं

Abrar Kashif
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दर्द-ए-मुहब्बत दर्द-ए-जुदाई दोनों को इक साथ मिला
तू भी तन्हा मैं भी तन्हा आ इस बात पे हाथ मिला

Abrar Kashif
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मैं अपने दोनों तरफ़ एक सा हूँ तेरे लिए
किसी से शर्त लगा फिर मुझे उछाल के देख

Abrar Kashif
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तरीक़े और भी हैं इस तरह परखा नहीं जाता
चराग़ों को हवा के सामने रक्खा नहीं जाता

मोहब्बत फ़ैसला करती है पहले चंद लम्हों में
जहाँ पर इश्क़ होता है वहाँ​ सोचा नहीं जाता

Abrar Kashif
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अपने दिल में बसाओगे हमको
और गले से लगाओगे हमको

हम नहीं इतने प्यार के क़ाबिल
तुम तो पागल बनाओगे हमको

Abrar Kashif
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करती है तो करने दे हवाओं को शरारत
मौसम का तकाज़ा है कि बालों को खुला छोड़

Abrar Kashif
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अब के हम तर्क-ए-रसूमात करके देखते हैं
बीच वालों के बिना बात करके देखते हैं

इससे पहले कि कोई फ़ैसला तलवार करे
आख़िरी बार मुलाक़ात करके देखते हैं

Abrar Kashif
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मेरा अरमान मेरी ख़्वाहिश नहीं है
ये दुनिया मेरी फ़रमाइश नहीं है

मैं तेरे ख़्वाब वापस कर रहा हूँ
मेरी आँखों में गुंजाइश नहीं है

Abrar Kashif
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हर एक लफ़्ज़ के तेवर ही और होते हैं
तेरे नगर के सुख़नवर ही और होते हैं

तुम्हारी आँखों में वो बात ही नहीं ऐ दोस्त
डुबोने वाले समंदर ही और होते हैं

Abrar Kashif
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घर की तक़सीम में अँगनाई गँवा बैठे हैं
फूल गुलशन से शनासाई गँवा बैठे हैं

बात आँखों से समझ लेने का दावा मत कर
हम इसी शौक़ में बीनाई गँवा बैठे हैं

Abrar Kashif
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दिन में मिल लेते कहीं रात ज़रूरी थी क्या?
बेनतीजा ये मुलाक़ात ज़रूरी थी क्या

मुझसे कहते तो मैं आँखों में बुला लेता तुम्हें
भीगने के लिए बरसात ज़रूरी थी क्या

Abrar Kashif
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अब तो लगता है कि आ जाएगी बारी मेरी
किसने दे दी तेरी आँखों को सुपारी मेरी

Abrar Kashif
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मंज़िलों का कौन जाने रहगुज़र अच्छी नहीं
उसकी आँखें ख़ूबसूरत है नज़र अच्छी नहीं

Abrar Kashif
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अगर तुम हो तो घबराने की कोई बात थोड़ी है
ज़रा सी बूँदा-बाँदी है बहुत बरसात थोड़ी है

ये राह-ए-इश्क़ है इसमें क़दम ऐसे ही उठते हैं
मोहब्बत सोचने वालों के बस की बात थोड़ी है

Abrar Kashif
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