Shahr Shayari
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Shahr Shayari

    पानी आँख में भरकर लाया जा सकता है
    अब भी जलता शहर बचाया जा सकता है

    Abbas Tabish
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    अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
    उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते जाते

    Rahat Indori
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    कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से
    ये नए मिज़ाज का शहर है ज़रा फ़ासले से मिला करो

    Bashir Badr
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    तुम्हारे शहर में तोहमत है ज़िंदा रहना भी
    जिन्हें अज़ीज़ थीं जानें वो मरते जाते हैं

    Abbas Tabish
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    तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
    मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे

    Qaisar-ul-Jafri
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    रोज़ बस्ते हैं कई शहर नए
    रोज़ धरती में समा जाते हैं

    Kaifi Azmi
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    इस शहर में किस से मिलें हमसे तो छूटीं महफ़िलें
    हर शख़्स तेरा नाम ले हर शख़्स दीवाना तिरा

    Ibn E Insha
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    हम घूम चुके बस्ती बन में
    इक आस की फाँस लिए मन में

    Ibn E Insha
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    हैं बाशिंदे उसी बस्ती के हम भी
    सो ख़ुद पर भी भरोसा क्यों करें हम

    Jaun Elia
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    उसके कहने पे जलाई गई सारी बस्ती
    तेरा कहना है कि सुल्तान बड़ा अच्छा है

    Monis faraz
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    जगह की क़ैद नहीं थी कोई कहीं बैठे
    जहाँ मक़ाम हमारा था हम वहीं बैठे

    अमीर-ए-शहर के आने पे उठना पड़ता है
    लिहाज़ा अगली सफ़ों में कभी नहीं बैठे

    Mehshar Afridi
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    किसे है वक़्त मोहब्बत में दर-ब-दर भटके
    मैं उसके शहर गया था किसी ज़रूरत से

    Riyaz Tariq
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    बस्ती बस्ती ख़ाक उड़ाये, बस वहशत का मारा हो
    उससे इश्क़ की आस न करना जिसका मन बंजारा हो

    ख़ुद को शाइर कहते रहना दिल को लाख सुकूँ दे दे
    लेकिन दुनिया की नज़रों में तुम अब भी आवारा हो

    Daagh Aligarhi
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    रोशनी बढ़ने लगी है शहर की
    चाँद छत पर आ गया है देखिए

    Divy Kamaldhwaj
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    ऐ शहर-ए-जान-ए-जाँ ऐ शहर-ए-हमदम
    अगर ज़िन्दा रहे फिर आयेंगे हम

    Shajar Abbas
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    बंदा किसी के साथ, ख़ुदा हो किसी के साथ
    जाने पराए शहर में क्या हो किसी के साथ

    Mueed Mirza
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    इतनी शोहरत तो मेरी आज भी इस शहर में है
    एक पत्ता न हिले मेरी इजाज़त के बग़ैर

    Mukesh Jha
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    नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
    कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है

    Nida Fazli
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    ये सर्द रात ये आवारगी ये नींद का बोझ
    हम अपने शहर में होते तो घर चले जाते

    Ummeed Fazli
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    'अल्वी' ये मो'जिज़ा है दिसम्बर की धूप का
    सारे मकान शहर के धोए हुए से हैं

    Mohammad Alvi
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