धूप पड़े उस पर तो तुम बादल बन जाना
अब वो मिलने आये तो उसको घर ठहराना।
तुमको दूर से देखते देखते गुज़र रही है
मर जाना पर किसी गरीब के काम न आना।
तुमसे इक दिन कहीं मिलेंगे हम
ख़र्च ख़ुद को तभी करेंगे हम
धूप निकली है तेरी बातों की
आज छत पर पड़े रहेंगे हम
रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं,
अपनी आँखे दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं
ये कांटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं
मुझे भी बख़्श दे लहजे की ख़ुशबयानी सब
तेरे असर में हैं अल्फ़ाज़ सब, म'आनी सब
मेरे बदन को खिलाती है फूल की मानिंद
कि उस निगाह में है धूप, छाँव, पानी सब
शदीद गर्मी में कैसे निकले वो फूल-चेहरा
सो अपने रस्ते में धूप दीवार हो रही है
धूप को साया ज़मीं को आसमाँ करती है माँ
हाथ रखकर मेरे सर पर सायबाँ करती है माँ
मेरी ख़्वाहिश और मेरी ज़िद उसके क़दमों पर निसार
हाँ की गुंज़ाइश न हो तो फिर भी हाँ करती है माँ
शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम
ज़िन्दगी है धूप तो मद-मस्त पुर्वाई सी तुम
चाहे महफ़िल में रहूँ चाहे अकेले में रहूँ
गूँजती रहती हो मुझ में शोख़ शहनाई सी तुम
जली हैं धूप में शक्लें जो माहताब की थीं
खिंची हैं काँटों पे जो पत्तियाँ गुलाब की थीं
तुम तो सर्दी की हसीं धूप का चेहरा हो जिसे
देखते रहते हैं दीवार से जाते हुए हम
घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है
पास हमारे आकर वो शर्माती है
तब जाकर के एक ग़ज़ल हो पाती है
उसको छूना छोटा मोटा खेल नहीं
गर्मी क्या सर्दी में लू लग जाती है
वो सर्दियों की धूप की तरह ग़ुरूब हो गया
लिपट रही है याद जिस्म से लिहाफ़ की तरह
मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में
क्यूँ तेरी याद का बादल मेरे सर पर आया