Dhoop Shayari
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Dhoop Shayari

    पहले ये काम बड़े प्यार से माँ करती थी
    अब हमें धूप जगाती है तो दुख होता है

    Munawwar Rana
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    उस वक़्त भी अक्सर तुझे हम ढूँढ़ने निकले
    जिस धूप में मज़दूर भी छत पर नहीं जाते

    Munawwar Rana
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    धूप पड़े उस पर तो तुम बादल बन जाना
    अब वो मिलने आये तो उसको घर ठहराना।

    तुमको दूर से देखते देखते गुज़र रही है
    मर जाना पर किसी गरीब के काम न आना।

    Tehzeeb Hafi
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    तुमसे इक दिन कहीं मिलेंगे हम
    ख़र्च ख़ुद को तभी करेंगे हम

    धूप निकली है तेरी बातों की
    आज छत पर पड़े रहेंगे हम

    Swapnil Tiwari
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    रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं,
    अपनी आँखे दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं

    ये कांटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
    राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं

    Subhan Asad
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    मुझे भी बख़्श दे लहजे की ख़ुशबयानी सब
    तेरे असर में हैं अल्फ़ाज़ सब, म'आनी सब

    मेरे बदन को खिलाती है फूल की मानिंद
    कि उस निगाह में है धूप, छाँव, पानी सब

    Subhan Asad
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    धूप में निकलो घटाओं में नहा कर देखो
    ज़िंदगी क्या है किताबों को हटा कर देखो

    Nida Fazli
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    शदीद गर्मी में कैसे निकले वो फूल-चेहरा
    सो अपने रस्ते में धूप दीवार हो रही है

    Shakeel Jamali
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    धूप को साया ज़मीं को आसमाँ करती है माँ
    हाथ रखकर मेरे सर पर सायबाँ करती है माँ

    मेरी ख़्वाहिश और मेरी ज़िद उसके क़दमों पर निसार
    हाँ की गुंज़ाइश न हो तो फिर भी हाँ करती है माँ

    Nawaz Deobandi
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    मैं बे-ख़याल कभी धूप में निकल आऊँ
    तो कुछ सहाब मिरे साथ साथ चलते हैं

    Farhat Abbas Shah
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    शोर की इस भीड़ में ख़ामोश तन्हाई सी तुम
    ज़िन्दगी है धूप तो मद-मस्त पुर्वाई सी तुम

    चाहे महफ़िल में रहूँ चाहे अकेले में रहूँ
    गूँजती रहती हो मुझ में शोख़ शहनाई सी तुम

    Kunwar Bechain
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    झूट पर उसके भरोसा कर लिया
    धूप इतनी थी कि साया कर लिया

    Shariq Kaifi
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    जली हैं धूप में शक्लें जो माहताब की थीं
    खिंची हैं काँटों पे जो पत्तियाँ गुलाब की थीं

    Dagh Dehlvi
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    तुम तो सर्दी की हसीं धूप का चेहरा हो जिसे
    देखते रहते हैं दीवार से जाते हुए हम

    Nomaan Shauque
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    घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है
    बताओ कैसे लिख दूँ धूप फागुन की नशीली है

    Adam Gondvi
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    चिलचिलाती धूप है और पैर में चप्पल नहीं
    जिस्म घायल है मगर ये हौसला घायल नहीं

    Tanoj Dadhich
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    पास हमारे आकर वो शर्माती है
    तब जाकर के एक ग़ज़ल हो पाती है

    उसको छूना छोटा मोटा खेल नहीं
    गर्मी क्या सर्दी में लू लग जाती है

    Tanoj Dadhich
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    वो सर्दियों की धूप की तरह ग़ुरूब हो गया
    लिपट रही है याद जिस्म से लिहाफ़ की तरह

    Musavvir Sabzwari
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    धूप तो धूप ही है इसकी शिकायत कैसी
    अब की बरसात में कुछ पेड़ लगाना साहब

    Nida Fazli
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    मैं बहुत ख़ुश था कड़ी धूप के सन्नाटे में
    क्यूँ तेरी याद का बादल मेरे सर पर आया

    Ahmad Mushtaq
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