क्या ख़ुशी में ज़िंदगी का होश कम रह जाएगा
ग़म अगर मिट भी गया एहसास-ए-ग़म रह जाएगा
उठाना ख़ुद ही पड़ता है थका टूटा बदन 'फ़ख़री'
कि जब तक साँस चलती है कोई कंधा नहीं देता
मत कहो कोई मुझे क्या ख़ाक कर पाया हूँ मैं
ख़ाक करने को नहीं इस दुनिया में आया हूँ मैं
मेरी पलकों के तले अब ख़्वाब लाखों दफ़्न हैं
आज फिर कहता हूँ ये मनहूस इक साया हूँ मैं
इक अधूरा गीत था मैं कल तलक जिनके बिना
वो बहारें आज पीछे छोड़कर आया हूँ मैं
इतनी क्यों बेचैन है तू इस घनेरी रात में
ले मुझे अब देख ले अब चाँद बन आया हूँ मैं
छाने को तो आज तक छप्पर नहीं छाया कभी
बादलों के गाँव पर बादल बना छाया हूँ मैं
चाह थी बन जाऊँगा मैं भी बहार-ए-ज़िंदगी
काँटा बनके रह गया गुल भी न बन पाया हूँ मैं
मौत मुझको भी जगह दे अपने आँचल में कहीं
ज़िंदगी की गोद में कुछ टूट कर आया हूँ मैं
मेरे अपने करते हैं कुछ क़द्र मेरी इस क़दर
जैसे इनको राह में सिक्का पड़ा पाया हूँ मैं
मैंने तो माना यही इंसानियत बिकती नहीं
और फिर बाज़ार में ख़ुद को खड़ा पाया हूँ मैं
मेरे मुँह को ताकते हैं लोग भी कुछ इस तरह
इनके हिस्से का निवाला भी कभी खाया हूँ मैं
दिल की बातें दिल में रखना और भी है
ग़म में गाना कोई नग़्मा और भी है
आप की हँसती हुई सूरत की ख़ातिर
रास्तों पर घर बनाना और भी है
थक के खिड़की के दरों से झाँकने को
जी मचलने का बहाना और भी है
मंज़िलें जब दूर तो परवाह क्या है
पर क़दम का लड़खड़ाना और भी है
फूल गुलशन में सभी मौजूद हैं पर
आप का महफ़िल में आना और भी है
सब परिंदे फड़फड़ा कर उड़ गए पर
बिन परों के अब यूँ उड़ना और भी है
जग रहे हैं चाँद तारे इक वजह से
बेवजह रातों को जगना और भी है
एक 'गौरव' है जो तन्हा एक साक़ी
शाम को जामों का लड़ना और भी है
फ़ाएदा ही नहीं लड़ाई में
फ़ाएदा ढूँढ पारसाई में
दिल में ऐसे किसी की याद आई
जैसे पत्थर गिरा हो खाई में
आज फिर साथ-साथ सोएँगे
आपके ग़म मेरी रजाई में
मैं तेरा हो सका न जीते जी
लाश ले लेना मुँह-दिखाई में
ऐसा रोया लिपट के मैं ख़ुद से
जान तक बह गई जुदाई में
था मुहब्बत का इक पुराना महल
मैं मिला हूँ उसी खुदाई में
जान दिल होश मैं मेरा सब कुछ
हार आया हूँ अँख-लड़ाई में
फिर से कुछ शे'र हो गए तुझ पर
आज लफ़्ज़ों से हाथा-पाई में
मुझको 'शादाब' ग़म है बस इसका
वो भी शामिल है जग-हँसाई में
हमने जिस मासूम परी को अपने दिल की जाँ बोला था
उसने हमको धोखा देकर और किसी को हाँ बोला था
सारे वादे भूल गई तुम कोई बात नहीं जानेमन
लेकिन ये कैसे भूली तुम मेरी माँ को माँ बोला था
ऐसा है मेरा यार कि रहवे परे-परे
छूता हूँ तो वो कहता है ये क्या अरे-अरे
उसके क़दम से बढ़ती है रौनक़ बगान की
सूखे शजर भी देते हैं पत्ते हरे-हरे
मैंने दवा बता दिया अब इसके बाद वो
बीमारियों के ऐब में रहकर मरे, मरे
क़ुर्बत के उस मुक़ाम पे आकर खड़ा हूँ मैं
दस्तक भी उनके दिल पे मैं दूँ हूँ डरे-डरे
कहता हूँ शायरों से मोहब्बत न कीजियो
और इसके बावजूद भी कोई करे, करे
ज़माने को रुलाते फिर रहे हैं
सुख़नवर ग़म उठाते फिर रहे हैं
ये शाइर लेके सब आसान बातें
उन्हें मुश्क़िल बनाते फिर रहे हैं
जो कहते हैं ख़ुदा है आख़िरी सच
हमें जन्नत दिखाते फिर रहे हैं
नहीं लगता कहीं भी दिल हमारा
सभी को आज़माते फिर रहे हैं
ग़म आया शक़्ल लेकर आज तेरी
सो ग़म में मुस्कुराते फिर रहे हैं
जो औरों को सहारा दे रहे थे
वो अब ख़ुद लड़खड़ाते फिर रहे हैं
कोई तो बात सूरज में भी होगी
जो ग्रह चक्कर लगाते फिर रहे हैं
मुहब्बत 'जौन' जैसी हो गई है
यक़ीं सबको दिलाते फिर रहे हैं
हम जब भी मुस्काएंगे, तुम रोओगे,
हम ऐसा छोड़ के जाएंगे, तुम रोओगे
मेरी महफ़िल में जब भी तुम आओगे
ताली लोग बजायेंगे, तुम रोओगे
तेरी गली का चर्चा होगा, और फिर हम
ऐसा रक़्स दिखाएंगे, तुम रोओगे
इक दिन बैठ के डोली में जब जाओगे
सब झूमें नाचे गाएंगे तुम रोओगे
हम को छोड़ के जाना इतना आसां नई
हम याद हि इतना आएंगे तुम रोओगे
तेरे नाम पे जिएंगे मर जायेंगे
हम ऐसा इश्क़ निभाएंगे तुम रोओगे
यार तो उसके सालगिराह पर क्या क्या तोहफें लाए हैं
और इधर हमने उसकी तस्वीर को शेर सुनाएं हैं
आप से बढ़कर कौन समझ सकता है रंग और खुशबू को
आपसे कोई बहस नहीं है आप उसके हमसाएं है
किसी बहाने से उसकी नाराजी खत्म तो करनी थी
उसके पसंदीदा शायर के शेर उसे भिजवाए हैं
अगर इंसां की फ़ितरत हम बदलते
मुहब्बत बाँटते, आलम बदलते
बदलना कुछ हमारे बस में होता
तो सबसे पहले तेरे ग़म बदलते
हम अपने सारे लम्हें कैद करते
हर इक सप्ताह इक अल्बम बदलते
हकीम अपना बदलते फिर रहे हो
असर पड़ता अगर मरहम बदलते
बदलते हम अगर पड़ती ज़रूरत
मगर औरों से थोड़ा कम बदलते
बदलते तुम हो हर मौसम मुताबिक
बदलते हम तो खुद मौसम बदलते
जिस फ़िल्म का हीरो मुझे होना था ऐ पपलू
उस फिल्म के दो दिन से टिकट बेच रहा हूँ
हर काम पुलिस वालों की मर्ज़ी से करूँगा
दारू भी मैं थाने के निकट बेच रहा हूँ
कहाँ कहाँ न तसव्वुर ने दाम फैलाए
हुदूद-ए-शाम-ओ-सहर से निकल के देख आए
नहीं पयाम रह-ए-नामा-ओ-पयाम तू है
अभी सबा से कहो उन के दिल को बहलाए
ग़ुरूर-ए-जादा-शनासी बजा सही लेकिन
सुराग़-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद भी कोई पाए
ख़ुदा वो दिन न दिखाए कि राहबर ये कहे
चले थे जाने कहाँ से कहाँ निकल आए
गुज़र गया कोई दरमाँदा-राह ये कहता
अब इस फ़ज़ा में कोई क़ाफ़िले न ठहराए
न जाने उन के मुक़द्दर में क्यूँ है तीरा-शबी
वो हम-नवा जो सहर को क़रीब-तर लाए
कोई फ़रेब-ए-नज़र है कि ताबनाक फ़ज़ा
किसे ख़बर कि यहाँ कितने चाँद गहनाए
ग़म-ए-ज़माना तिरी ज़ुल्मतें ही क्या कम थीं
कि बढ़ चले हैं अब उन गेसुओं के भी साए
बहुत बुलंद है इस से मिरा मक़ाम-ए-ग़ज़ल
अगरचे मैं ने मोहब्बत के गीत भी गाए
'हफ़ीज़' अपना मुक़द्दर 'हफ़ीज़' अपना नसीब
गिरे थे फूल मगर हम ने ज़ख़्म ही खाए
कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था
शाम से ता सुब्ह दम-ए-बालीं पे सर यकजा न था
शोहरा-ए-आलम उसे युम्न-ए-मोहब्बत ने किया
वर्ना मजनूँ एक ख़ाक उफ़्तादा-ए-वीराना था
मंज़िल उस मह की रहा जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं
अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था
इक निगाह-ए-आश्ना को भी वफ़ा करता नहीं
वा हुईं मिज़्गाँ कि सब्ज़ा सब्ज़ा-ए-बेगाना था
रोज़ ओ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे
ऐ दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था
याद अय्यामे कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश
या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था
जिस को देखा हम ने इस वहशत-कदे में दहर के
या सिड़ी या ख़ब्ती या मजनून या दीवाना था
बाद ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा
हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था
ग़ैर के कहने से मारा उन ने हम को बे-गुनाह
ये न समझा वो कि वाक़े में भी कुछ था या न था
सुब्ह होते वो बिना-गोश आज याद आया मुझे
जो गिरा दामन पे आँसू गौहर-ए-यक-दाना था
शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त
शम्अ का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था
रात उस की चश्म-ए-मयगूँ ख़्वाब में देखी थी मैं
सुब्ह सोते से उठा तो सामने पैमाना था
रहम कुछ पैदा किया शायद कि उस बे-रहम ने
गोश उस का शब इधर ता आख़िर-ए-अफ़्साना था
'मीर' भी क्या मस्त ताफ़ेह था शराब-ए-इश्क़ का
लब पे आशिक़ के हमेशा नारा-ए-मस्ताना था
मिलने की तरह मुझसे वो पल भर नहीं मिलता
दिल उस से मिला जिससे मुक़द्दर नहीं मिलता
अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
क्या जाने गरेबाँ होगा कहाँ दामन से बड़ा वीराने का
वाइ'ज़ न सुनेगा साक़ी की लालच है उसे पैमाने का
मुझ से हों अगर ऐसी बातें मैं नाम न लूँ मयख़ाने का
क्या जाने कहेगा क्या आ कर है दौर यहाँ पैमाने का
अल्लाह करे वाइ'ज़ को कभी रस्ता न मिले मयख़ाने का
तुर्बत से लगा करता महशर सुनते हैं कोई मिलता ही नहीं
मंज़िल है बड़ी आबादी की रस्ता है बड़ा वीराने का
जन्नत में पिएगा क्यूँकर ऐ शैख़ यहाँ गर मश्क़ न की
अब माने न माने तेरी ख़ुशी है काम मिरा समझाने का
जी चाहा जहाँ पर रो दिया है पाँव में चुभे और टूट गए
ख़ारों ने भी दिल में सोच लिया है कौन यहाँ दीवाने का
हैं तंग तिरी मय-कश साक़ी ये पढ़ के नमाज़ आता है यहीं
या शैख़ की तौबा तुड़वा दे या वक़्त बदल मयख़ाने का
हर सुब्ह को आह सर से दिल-ए-शादाब जराहत रहता है
गर यूँ ही रहेगी बाद-ए-सहर ये फूल नहीं मुरझाने का
बहके हुए वाइ'ज़ से मिल कर क्यूँ बैठे हुए हो मय-ख़्वारो
गर तोड़ दे ये सब जाम-ओ-सुबू क्या कर लोगे दीवाने का
अहबाब ये तुम कहते हो बजा वो बज़्म-ए-अदू में बैठे हैं
वो आएँ न आएँ उन की ख़ुशी चर्चा तो करो मर जाने का
उस वक़्त खुलेगा हिस को भी एहसास-ए-मोहब्बत है कि नहीं
जब शम्अ' सर-ए-महफ़िल रो कर मुँह देखेगी परवाने का
बादल के अंधेरे में छुप कर मयख़ाने में आ बैठा है
गर चाँदनी हो जाएगी 'क़मर' ये शैख़ नहीं फिर जाने का
कभी ज़मीं पे कभी आसमाँ पे छाए जा
उजाड़ने के लिए बस्तियाँ बसाए जा
ख़िज़र का साथ दिए जा क़दम बढ़ाए जा
फ़रेब खाए हुए का फ़रेब खाए जा
तिरी नज़र में सितारे हैं ऐ मिरे प्यारे
उड़ाए जा तह-ए-अफ़्लाक ख़ाक उड़ाए जा
नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल
तिरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा
अनाड़ियों से तुझे खेलना पड़ा ऐ दोस्त
सुझा सुझा के नई चाल मात खाए जा
शराब ख़ुम से दिए जा नशा तबस्सुम से
कभी नज़र से कभी जाम से पिलाए जा
दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए
बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए
इस अंजुमन में आप को आना है बार बार
दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिए
माना कि दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास
लेकिन ये क्या कि ग़ैर का एहसान लीजिए
कहिए तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ
मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए
रात की धड़कन जब तक जारी रहती है
सोते नहीं हम ज़िम्मेदारी रहती है
जब से तू ने हल्की हल्की बातें कीं
यार तबीअत भारी भारी रहती है
पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में
हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है
वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं
जिन लोगों के पास सवारी रहती है
छत से उस की धूप के नेज़े आते हैं
जब आँगन में छाँव हमारी रहती है
घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया
घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तो नवा है महरम-ए-गोश हो
वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में
तू बचा बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइना
कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में
दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन
न तिरी हिकायत-ए-सोज़ में न मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में
न कहीं जहाँ में अमाँ मिली जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली
मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में
न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ
न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ मैं
मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी
क्यूँ तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी
बअ'द मरने के भी छोड़ी न रिफ़ाक़त मेरी
मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी
मैं ने आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी खेंचा तो कहा
पिस गई पिस गई बेदर्द नज़ाकत मेरी
आईना सुब्ह-ए-शब-ए-वस्ल जो देखा तो कहा
देख ज़ालिम ये थी शाम को सूरत मेरी
यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले
आज क्यूँ दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी
हुस्न और इश्क़ हम-आग़ोश नज़र आ जाते
तेरी तस्वीर में खिंच जाती जो हैरत मेरी
किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर'
वो मिरा घर है रहे जिस में मोहब्बत मेरी