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    क्या ख़ुशी में ज़िंदगी का होश कम रह जाएगा
    ग़म अगर मिट भी गया एहसास-ए-ग़म रह जाएगा

    Shakeel Badayuni
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    कुछ इस तरह से गुज़ारी है ज़िन्दगी जैसे
    तमाम उम्र किसी दूसरे के घर में रहा

    Ahmad Faraz
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    वफ़ा करके तो हारे हैं कई बार
    दग़ा करके भी हारे इस दफ़ा हम

    Rovej sheikh
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    उठाना ख़ुद ही पड़ता है थका टूटा बदन 'फ़ख़री'
    कि जब तक साँस चलती है कोई कंधा नहीं देता

    Zahid Fakhri
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    मत कहो कोई मुझे क्या ख़ाक कर पाया हूँ मैं
    ख़ाक करने को नहीं इस दुनिया में आया हूँ मैं

    मेरी पलकों के तले अब ख़्वाब लाखों दफ़्न हैं
    आज फिर कहता हूँ ये मनहूस इक साया हूँ मैं

    इक अधूरा गीत था मैं कल तलक जिनके बिना
    वो बहारें आज पीछे छोड़कर आया हूँ मैं

    इतनी क्यों बेचैन है तू इस घनेरी रात में
    ले मुझे अब देख ले अब चाँद बन आया हूँ मैं

    छाने को तो आज तक छप्पर नहीं छाया कभी
    बादलों के गाँव पर बादल बना छाया हूँ मैं

    चाह थी बन जाऊँगा मैं भी बहार-ए-ज़िंदगी
    काँटा बनके रह गया गुल भी न बन पाया हूँ मैं

    मौत मुझको भी जगह दे अपने आँचल में कहीं
    ज़िंदगी की गोद में कुछ टूट कर आया हूँ मैं

    मेरे अपने करते हैं कुछ क़द्र मेरी इस क़दर
    जैसे इनको राह में सिक्का पड़ा पाया हूँ मैं

    मैंने तो माना यही इंसानियत बिकती नहीं
    और फिर बाज़ार में ख़ुद को खड़ा पाया हूँ मैं

    मेरे मुँह को ताकते हैं लोग भी कुछ इस तरह
    इनके हिस्से का निवाला भी कभी खाया हूँ मैं

    nakul kumar
    42 Likes

    दिल की बातें दिल में रखना और भी है
    ग़म में गाना कोई नग़्मा और भी है

    आप की हँसती हुई सूरत की ख़ातिर
    रास्तों पर घर बनाना और भी है

    थक के खिड़की के दरों से झाँकने को
    जी मचलने का बहाना और भी है

    मंज़िलें जब दूर तो परवाह क्या है
    पर क़दम का लड़खड़ाना और भी है

    फूल गुलशन में सभी मौजूद हैं पर
    आप का महफ़िल में आना और भी है

    सब परिंदे फड़फड़ा कर उड़ गए पर
    बिन परों के अब यूँ उड़ना और भी है

    जग रहे हैं चाँद तारे इक वजह से
    बेवजह रातों को जगना और भी है

    एक 'गौरव' है जो तन्हा एक साक़ी
    शाम को जामों का लड़ना और भी है

    Safeer Ray
    11 Likes

    इन आँखों का सूनापन ये कहता है
    इन आँखों ने उन आँखों को देखा है

    Bhaskar Shukla
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    अजीब सानेहा मुझ पर गुज़र गया यारो
    मैं अपने साए से कल रात डर गया यारो

    Shahryar
    28 Likes

    दिवाली भी दिवाली अब नहीं है
    तुम्हारे साथ हर दिन थी दिवाली

    Tanoj Dadhich
    46 Likes

    इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए
    और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए

    Vipul Kumar
    83 Likes

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Best from Verified

    फ़ाएदा ही नहीं लड़ाई में
    फ़ाएदा ढूँढ पारसाई में

    दिल में ऐसे किसी की याद आई
    जैसे पत्थर गिरा हो खाई में

    आज फिर साथ-साथ सोएँगे
    आपके ग़म मेरी रजाई में

    मैं तेरा हो सका न जीते जी
    लाश ले लेना मुँह-दिखाई में

    ऐसा रोया लिपट के मैं ख़ुद से
    जान तक बह गई जुदाई में

    था मुहब्बत का इक पुराना महल
    मैं मिला हूँ उसी खुदाई में

    जान दिल होश मैं मेरा सब कुछ
    हार आया हूँ अँख-लड़ाई में

    फिर से कुछ शे'र हो गए तुझ पर
    आज लफ़्ज़ों से हाथा-पाई में

    मुझको 'शादाब' ग़म है बस इसका
    वो भी शामिल है जग-हँसाई में

    Shadab Javed

    पहले लगा था हिज्र में जाएँगे जान से
    पर जी रहे हैं और भी हम इत्मिनान से

    Ankit Maurya
    69 Likes

    हमने जिस मासूम परी को अपने दिल की जाँ बोला था
    उसने हमको धोखा देकर और किसी को हाँ बोला था

    सारे वादे भूल गई तुम कोई बात नहीं जानेमन
    लेकिन ये कैसे भूली तुम मेरी माँ को माँ बोला था

    Tanoj Dadhich
    41 Likes

    बिजली जाने पर भी जो चिल्लाता था
    तेरे जाने पर वो क्यों ख़ामोश रहा ?

    Tanoj Dadhich
    58 Likes

    न जाने हमारा भी क्या ही बनेगा
    बहुत देर से चाक पर घूमते हैं

    Afzal Ali Afzal

    न जाने हमारा भी क्या ही बनेगा
    बहुत देर से चाक पर घूमते हैं

    Afzal Ali Afzal

    ऐसा है मेरा यार कि रहवे परे-परे
    छूता हूँ तो वो कहता है ये क्या अरे-अरे

    उसके क़दम से बढ़ती है रौनक़ बगान की
    सूखे शजर भी देते हैं पत्ते हरे-हरे

    मैंने दवा बता दिया अब इसके बाद वो
    बीमारियों के ऐब में रहकर मरे, मरे

    क़ुर्बत के उस मुक़ाम पे आकर खड़ा हूँ मैं
    दस्तक भी उनके दिल पे मैं दूँ हूँ डरे-डरे

    कहता हूँ शायरों से मोहब्बत न कीजियो
    और इसके बावजूद भी कोई करे, करे

    Ashutosh Vdyarthi

    मैं समझता हूँ मोल मिट्टी का
    मेरे खेतों में सोना उगता है

    Afzal Ali Afzal

    ज़माने को रुलाते फिर रहे हैं
    सुख़नवर ग़म उठाते फिर रहे हैं

    ये शाइर लेके सब आसान बातें
    उन्हें मुश्क़िल बनाते फिर रहे हैं

    जो कहते हैं ख़ुदा है आख़िरी सच
    हमें जन्नत दिखाते फिर रहे हैं

    नहीं लगता कहीं भी दिल हमारा
    सभी को आज़माते फिर रहे हैं

    ग़म आया शक़्ल लेकर आज तेरी
    सो ग़म में मुस्कुराते फिर रहे हैं

    जो औरों को सहारा दे रहे थे
    वो अब ख़ुद लड़खड़ाते फिर रहे हैं

    कोई तो बात सूरज में भी होगी
    जो ग्रह चक्कर लगाते फिर रहे हैं

    मुहब्बत 'जौन' जैसी हो गई है
    यक़ीं सबको दिलाते फिर रहे हैं

    Divy Kamaldhwaj

    हम जब भी मुस्काएंगे, तुम रोओगे,
    हम ऐसा छोड़ के जाएंगे, तुम रोओगे

    मेरी महफ़िल में जब भी तुम आओगे
    ताली लोग बजायेंगे, तुम रोओगे

    तेरी गली का चर्चा होगा, और फिर हम
    ऐसा रक़्स दिखाएंगे, तुम रोओगे

    इक दिन बैठ के डोली में जब जाओगे
    सब झूमें नाचे गाएंगे तुम रोओगे

    हम को छोड़ के जाना इतना आसां नई
    हम याद हि इतना आएंगे तुम रोओगे

    तेरे नाम पे जिएंगे मर जायेंगे
    हम ऐसा इश्क़ निभाएंगे तुम रोओगे

    Shadab Asghar

Listen Shayari

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Kuchh baaten khud tak hee rakhana, baaton ke par hote hain
Voice: Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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purane gham bhulaane mein ziyaada kuchh nahin lagta
Voice: Saurabh Mehta 'Alfaaz'
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tum ko vehshat to seekha di guzaarein laayak
Voice: Yogesh Bhatt
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tapte sehra mein na dariya ki rawaani mein hoon main
Voice: Asif Kaifi
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ye marzi khud usi ki hai mujhe kya vo jidhar jaaye
Voice: Saurabh Mehta 'Alfaaz'

Poetistic Choice

    यार तो उसके सालगिराह पर क्या क्या तोहफें लाए हैं
    और इधर हमने उसकी तस्वीर को शेर सुनाएं हैं

    आप से बढ़कर कौन समझ सकता है रंग और खुशबू को
    आपसे कोई बहस नहीं है आप उसके हमसाएं है

    किसी बहाने से उसकी नाराजी खत्म तो करनी थी
    उसके पसंदीदा शायर के शेर उसे भिजवाए हैं

    Ali Zaryoun
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    इलाज ये है कि मजबूर कर दिया जाऊँ
    वगरना यूँ तो किसी की नहीं सुनी मैंने

    Jaun Elia
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    अगर इंसां की फ़ितरत हम बदलते
    मुहब्बत बाँटते, आलम बदलते

    बदलना कुछ हमारे बस में होता
    तो सबसे पहले तेरे ग़म बदलते

    हम अपने सारे लम्हें कैद करते
    हर इक सप्ताह इक अल्बम बदलते

    हकीम अपना बदलते फिर रहे हो
    असर पड़ता अगर मरहम बदलते

    बदलते हम अगर पड़ती ज़रूरत
    मगर औरों से थोड़ा कम बदलते

    बदलते तुम हो हर मौसम मुताबिक
    बदलते हम तो खुद मौसम बदलते

    Anand Verma

    आपकी सादा दिली ख़ुद आपकी तौहीन है
    हुस्न वालों को ज़रा मग़रूर होना चाहिए

    Abbas Qamar
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    वो कहते हैं मैं ज़िंदगानी हूँ तेरी
    ये सच है तो उन का भरोसा नहीं है

    Aasi Ghazipuri
    18 Likes

    दिखाई दिए यूँ कि बे-ख़ुद किया
    हमें आप से भी जुदा कर चले

    Meer Taqi Meer
    25 Likes

    जिस फ़िल्म का हीरो मुझे होना था ऐ पपलू
    उस फिल्म के दो दिन से टिकट बेच रहा हूँ

    हर काम पुलिस वालों की मर्ज़ी से करूँगा
    दारू भी मैं थाने के निकट बेच रहा हूँ

    Paplu Lucknawi
    23 Likes

    कहाँ कहाँ न तसव्वुर ने दाम फैलाए
    हुदूद-ए-शाम-ओ-सहर से निकल के देख आए

    नहीं पयाम रह-ए-नामा-ओ-पयाम तू है
    अभी सबा से कहो उन के दिल को बहलाए

    ग़ुरूर-ए-जादा-शनासी बजा सही लेकिन
    सुराग़-ए-मंज़िल-ए-मक़्सूद भी कोई पाए

    ख़ुदा वो दिन न दिखाए कि राहबर ये कहे
    चले थे जाने कहाँ से कहाँ निकल आए

    गुज़र गया कोई दरमाँदा-राह ये कहता
    अब इस फ़ज़ा में कोई क़ाफ़िले न ठहराए

    न जाने उन के मुक़द्दर में क्यूँ है तीरा-शबी
    वो हम-नवा जो सहर को क़रीब-तर लाए

    कोई फ़रेब-ए-नज़र है कि ताबनाक फ़ज़ा
    किसे ख़बर कि यहाँ कितने चाँद गहनाए

    ग़म-ए-ज़माना तिरी ज़ुल्मतें ही क्या कम थीं
    कि बढ़ चले हैं अब उन गेसुओं के भी साए

    बहुत बुलंद है इस से मिरा मक़ाम-ए-ग़ज़ल
    अगरचे मैं ने मोहब्बत के गीत भी गाए

    'हफ़ीज़' अपना मुक़द्दर 'हफ़ीज़' अपना नसीब
    गिरे थे फूल मगर हम ने ज़ख़्म ही खाए

    Hafeez Hoshiarpuri

    कल शब-ए-हिज्राँ थी लब पर नाला बीमाराना था
    शाम से ता सुब्ह दम-ए-बालीं पे सर यकजा न था

    शोहरा-ए-आलम उसे युम्न-ए-मोहब्बत ने किया
    वर्ना मजनूँ एक ख़ाक उफ़्तादा-ए-वीराना था

    मंज़िल उस मह की रहा जो मुद्दतों ऐ हम-नशीं
    अब वो दिल गोया कि इक मुद्दत का मातम-ख़ाना था

    इक निगाह-ए-आश्ना को भी वफ़ा करता नहीं
    वा हुईं मिज़्गाँ कि सब्ज़ा सब्ज़ा-ए-बेगाना था

    रोज़ ओ शब गुज़रे है पेच-ओ-ताब में रहते तुझे
    ऐ दिल-ए-सद-चाक किस की ज़ुल्फ़ का तू शाना था

    याद अय्यामे कि अपने रोज़ ओ शब की जा-ए-बाश
    या दर-ए-बाज़-ए-बयाबाँ या दर-ए-मय-ख़ाना था

    जिस को देखा हम ने इस वहशत-कदे में दहर के
    या सिड़ी या ख़ब्ती या मजनून या दीवाना था

    बाद ख़ूँ-रेज़ी के मुद्दत बे-हिना रंगीं रहा
    हाथ उस का जो मिरे लोहू में गुस्ताख़ाना था

    ग़ैर के कहने से मारा उन ने हम को बे-गुनाह
    ये न समझा वो कि वाक़े में भी कुछ था या न था

    सुब्ह होते वो बिना-गोश आज याद आया मुझे
    जो गिरा दामन पे आँसू गौहर-ए-यक-दाना था

    शब फ़रोग़-ए-बज़्म का बाइस हुआ था हुस्न-ए-दोस्त
    शम्अ का जल्वा ग़ुबार-ए-दीदा-ए-परवाना था

    रात उस की चश्म-ए-मयगूँ ख़्वाब में देखी थी मैं
    सुब्ह सोते से उठा तो सामने पैमाना था

    रहम कुछ पैदा किया शायद कि उस बे-रहम ने
    गोश उस का शब इधर ता आख़िर-ए-अफ़्साना था

    'मीर' भी क्या मस्त ताफ़ेह था शराब-ए-इश्क़ का
    लब पे आशिक़ के हमेशा नारा-ए-मस्ताना था

    Meer Taqi Meer

    मिलने की तरह मुझसे वो पल भर नहीं मिलता
    दिल उस से मिला जिससे मुक़द्दर नहीं मिलता

    Naseer Turabi
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    अब कैसे रफ़ू पैराहन हो इस आवारा दीवाने का
    क्या जाने गरेबाँ होगा कहाँ दामन से बड़ा वीराने का

    वाइ'ज़ न सुनेगा साक़ी की लालच है उसे पैमाने का
    मुझ से हों अगर ऐसी बातें मैं नाम न लूँ मयख़ाने का

    क्या जाने कहेगा क्या आ कर है दौर यहाँ पैमाने का
    अल्लाह करे वाइ'ज़ को कभी रस्ता न मिले मयख़ाने का

    तुर्बत से लगा करता महशर सुनते हैं कोई मिलता ही नहीं
    मंज़िल है बड़ी आबादी की रस्ता है बड़ा वीराने का

    जन्नत में पिएगा क्यूँकर ऐ शैख़ यहाँ गर मश्क़ न की
    अब माने न माने तेरी ख़ुशी है काम मिरा समझाने का

    जी चाहा जहाँ पर रो दिया है पाँव में चुभे और टूट गए
    ख़ारों ने भी दिल में सोच लिया है कौन यहाँ दीवाने का

    हैं तंग तिरी मय-कश साक़ी ये पढ़ के नमाज़ आता है यहीं
    या शैख़ की तौबा तुड़वा दे या वक़्त बदल मयख़ाने का

    हर सुब्ह को आह सर से दिल-ए-शादाब जराहत रहता है
    गर यूँ ही रहेगी बाद-ए-सहर ये फूल नहीं मुरझाने का

    बहके हुए वाइ'ज़ से मिल कर क्यूँ बैठे हुए हो मय-ख़्वारो
    गर तोड़ दे ये सब जाम-ओ-सुबू क्या कर लोगे दीवाने का

    अहबाब ये तुम कहते हो बजा वो बज़्म-ए-अदू में बैठे हैं
    वो आएँ न आएँ उन की ख़ुशी चर्चा तो करो मर जाने का

    उस वक़्त खुलेगा हिस को भी एहसास-ए-मोहब्बत है कि नहीं
    जब शम्अ' सर-ए-महफ़िल रो कर मुँह देखेगी परवाने का

    बादल के अंधेरे में छुप कर मयख़ाने में आ बैठा है
    गर चाँदनी हो जाएगी 'क़मर' ये शैख़ नहीं फिर जाने का

    Qamar Jalalvi

    कभी ज़मीं पे कभी आसमाँ पे छाए जा
    उजाड़ने के लिए बस्तियाँ बसाए जा

    ख़िज़र का साथ दिए जा क़दम बढ़ाए जा
    फ़रेब खाए हुए का फ़रेब खाए जा

    तिरी नज़र में सितारे हैं ऐ मिरे प्यारे
    उड़ाए जा तह-ए-अफ़्लाक ख़ाक उड़ाए जा

    नहीं इताब-ए-ज़माना ख़िताब के क़ाबिल
    तिरा जवाब यही है कि मुस्कुराए जा

    अनाड़ियों से तुझे खेलना पड़ा ऐ दोस्त
    सुझा सुझा के नई चाल मात खाए जा

    शराब ख़ुम से दिए जा नशा तबस्सुम से
    कभी नज़र से कभी जाम से पिलाए जा

    Hafeez Jalandhari

    हर एक सम्त यहाँ वहशतों का मस्कन है
    जुनूँ के वास्ते सहरा ओ आशियाना क्या

    Azhar Iqbal
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    दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए
    बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए

    इस अंजुमन में आप को आना है बार बार
    दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिए

    माना कि दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास
    लेकिन ये क्या कि ग़ैर का एहसान लीजिए

    कहिए तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ
    मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

    Shahryar

    रात की धड़कन जब तक जारी रहती है
    सोते नहीं हम ज़िम्मेदारी रहती है

    जब से तू ने हल्की हल्की बातें कीं
    यार तबीअत भारी भारी रहती है

    पाँव कमर तक धँस जाते हैं धरती में
    हाथ पसारे जब ख़ुद्दारी रहती है

    वो मंज़िल पर अक्सर देर से पहुँचे हैं
    जिन लोगों के पास सवारी रहती है

    छत से उस की धूप के नेज़े आते हैं
    जब आँगन में छाँव हमारी रहती है

    घर के बाहर ढूँढता रहता हूँ दुनिया
    घर के अंदर दुनिया-दारी रहती है

    Rahat Indori

    मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो
    ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा

    Bashir Badr
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    ठोकरें खा के सँभलना नहीं आता है मुझे
    चल मिरे साथ कि चलना नहीं आता है मुझे

    Farhat Ehsaas
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    कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
    कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में

    तरब-आशना-ए-ख़रोश हो तो नवा है महरम-ए-गोश हो
    वो सरोद क्या कि छुपा हुआ हो सुकूत-ए-पर्दा-ए-साज़ में

    तू बचा बचा के न रख इसे तिरा आइना है वो आइना
    कि शिकस्ता हो तो अज़ीज़-तर है निगाह-ए-आइना-साज़ में

    दम-ए-तौफ़ किरमक-ए-शम्अ ने ये कहा कि वो असर-ए-कुहन
    न तिरी हिकायत-ए-सोज़ में न मिरी हदीस-ए-गुदाज़ में

    न कहीं जहाँ में अमाँ मिली जो अमाँ मिली तो कहाँ मिली
    मिरे जुर्म-ए-ख़ाना-ख़राब को तिरे अफ़्व-ए-बंदा-नवाज़ में

    न वो इश्क़ में रहीं गर्मियाँ न वो हुस्न में रहीं शोख़ियाँ
    न वो ग़ज़नवी में तड़प रही न वो ख़म है ज़ुल्फ़-ए-अयाज़ मैं

    मैं जो सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
    तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में

    Allama Iqbal

    एक दिन दोनों ने अपनी हार मानी एक साथ
    एक दिन जिस से झगड़ते थे उसी के हो गए

    Nomaan Shauque
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    हँस के फ़रमाते हैं वो देख के हालत मेरी
    क्यूँ तुम आसान समझते थे मोहब्बत मेरी

    बअ'द मरने के भी छोड़ी न रिफ़ाक़त मेरी
    मेरी तुर्बत से लगी बैठी है हसरत मेरी

    मैं ने आग़ोश-ए-तसव्वुर में भी खेंचा तो कहा
    पिस गई पिस गई बेदर्द नज़ाकत मेरी

    आईना सुब्ह-ए-शब-ए-वस्ल जो देखा तो कहा
    देख ज़ालिम ये थी शाम को सूरत मेरी

    यार पहलू में है तन्हाई है कह दो निकले
    आज क्यूँ दिल में छुपी बैठी है हसरत मेरी

    हुस्न और इश्क़ हम-आग़ोश नज़र आ जाते
    तेरी तस्वीर में खिंच जाती जो हैरत मेरी

    किस ढिटाई से वो दिल छीन के कहते हैं 'अमीर'
    वो मिरा घर है रहे जिस में मोहब्बत मेरी

    Ameer Minai