Meer Taqi Meer

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Meer Taqi Meer shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in Meer Taqi Meer's shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
  • Ghazal

फूल गुल शम्स-ओ-क़मर सारे ही थे
पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत

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शाम से कुछ बुझा सा रहता हूँ
दिल हुआ है चराग़ मुफ़्लिस का

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दिल वो नगर नहीं कि फिर आबाद हो सके
पछताओगे सुनो हो ये बस्ती उजाड़ कर

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इक़रार में कहाँ है इंकार की सी ख़ूबी
होता है शौक़ ग़ालिब उस की नहीं नहीं पर

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नाहक़ हम मजबूरों पर ये तोहमत है मुख़्तारी की
चाहते हैं सो आप करें हैं हम को अबस बदनाम किया

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वस्ल में रंग उड़ गया मेरा
क्या जुदाई को मुँह दिखाऊँगा

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न रक्खो कान नज़्म-ए-शाइ'रान-ए-हाल पर इतने
चलो टुक 'मीर' को सुनने कि मोती से पिरोता है

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'मीर' साहिब ज़माना नाज़ुक है
दोनों हाथों से थामिए दस्तार

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ओहदे से निकलें किस तरह आशिक़
एक अदा उसकी है हज़ार-फ़रेब

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दिल-ख़राशी-ओ-जिगर-चाकी-ओ-ख़ूँ-अफ़्शानी
हूँ तो नाकाम प रहते हैं मुझे काम बहुत

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लगा आग पानी को दौड़े है तू
ये गर्मी तेरी इस शरारत के बाद

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गूँध के गोया पत्ती गुल की वो तरकीब बनाई है
रंग बदन का तब देखो जब चोली भीगे पसीने में

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क्या कहूँ तुम से मैं कि क्या है इश्क़
जान का रोग है बला है इश्क़

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इश्क़ में जी को सब्र ओ ताब कहाँ
उस से आँखें लड़ीं तो ख़्वाब कहाँ

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दिल्ली में आज भीक भी मिलती नहीं उन्हें
था कल तलक दिमाग़ जिन्हें ताज-ओ-तख़्त का

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बे-ख़ुदी ले गई कहाँ हम को
देर से इंतिज़ार है अपना

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पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

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उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

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ये फ़न्न-ए-इश्क़ है आवे उसे तीनत में जिस की हो
तू ज़ाहिद पीर-ए-नाबालिग़ है बे-तह तुझ को क्या आवे

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रोते फिरते हैं सारी सारी रात
अब यही रोज़गार है अपना

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