उन्हीं के फ़ैज़ से बाज़ार-ए-अक़्ल रौशन है,
जो गाह गाह जुनूँ इख़्तियार करते रहे
मुझ से कहा जिब्रील-ए-जुनूँ ने ये भी वही-ए-इलाही है
मज़हब तो बस मज़हब-ए-दिल है बाक़ी सब गुमराही है
भोले बन कर हाल न पूछ बहते हैं अश्क तो बहने दो
जिस से बढ़े बेचैनी दिल की ऐसी तसल्ली रहने दो
जाने कितनी कहानियाँ समेटे रहा होगा
वो जो शख़्स हाल-ए-दिल बायाँ करता भी नहीं
दर्द कितनी होगी, बेचैनी कितनी होगी
वो ज़ुबान जो किसी से कुछ कहता ही नहीं
मेरी अक्ल-ओ-होश की सब हालतें
तुमने साँचे में जुनूँ के ढाल दी
कर लिया था मैंने अहद-ए-तर्क-ए-इश्क़
तुमने फिर बाँहें गले में डाल दी
करे जो क़ैद जुनूं को वो जाल मत देना
हो जिसमें होश उसे ऐसा हाल मत देना
जो मुझसे मिलने का तुमको कभी ख़याल आये
तो इस ख़याल को तुम कल पे टाल मत देना
ख़ुदा से तो कभी दुनिया, कभी ख़ुद से लड़ा हूँ मै
जुनूँ-ए-इश्क़ में मत पूछ, दिल कितनों के तोड़े हैं
पहले कहता है जुनूँ उसका गिरेबान पकड़
फिर मेरा दिल मुझे कहता है इधर कान पकड़
ऐसी वहशत भी न हो घर के दरो बाम कहें
कोई आवाज़ ही ले आ कोई मेहमान पकड़
जीने के और भी जहाँ में बंद-ओ-बस्त थे
यह और बात थी कि हम बादा'परस्त थे
तू आ चुका था फिर भी तेरा इंतज़ार था
हम याद में 'जस्सर' तेरी इस दरजा मस्त थे
खोने का तुझको डर निकले,
बेचैनी से हम मर निकले,
साँसों में तब साँसें आईं,
जब दिल के तुम अंदर निकले
अंधों की बेचैनी को तुम क्या जानो दुनियावालों
तुमने तो दोनों आँखों से ख़ूब उजाले देखे हैं
उस के लहजे में हमेशा ही सुरूर है बहुत
इसलिए तो अपने आप पर ग़ुरूर है बहुत
उस की आँखों में नज़ारे ही नज़ारे दिखते हैं
क्यों कि उन में ख़ूबसूरती का नूर है बहुत
तल्ख़ बातों से ही मल्बूस न रहती है ज़बाँ
मीठे अल्फ़ाज़ ज़बानों को क़बा देते हैं
मैली पोशाक लपेटे वो मलंगों से लोग
मस्त होने पे ख़ुदा तक भी बना देते हैं