A R Sahil "Aleeg"

A R Sahil "Aleeg"

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A R Sahil "Alig" shayari collection includes sher, ghazal and nazm available in Hindi and English. Dive in A R Sahil "Alig"'s shayari and don't forget to save your favorite ones.

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  • Sher
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रहे क़ाएम-ओ-दाइम अहद-ओ-पैमाँ पर
कहाँ मिलते हैं ऐसे नस्ल-ए-आदम अब

A R Sahil "Aleeg"

एक दूजे में ऐसी अनबन है
जैसे पत्थर के आगे दर्पन है

किस से उम्मीद अम्न की रक्खे
आदमी आदमी का दुश्मन है

A R Sahil "Aleeg"

ख़्वाब में ही सही इबादत हो
आपके दर की बस ज़ियारत हो

ग़ैर को क्यों करे भला सज्दा
वो जिसे आपसे मुहब्बत हो

A R Sahil "Aleeg"

वो गिरफ़्तार जो करे तो फिर
गेसुओं के क़फ़स में मर जाए

ये तमन्ना है एक आशिक़ की
इश्क़ की दस्तरस में मर जाए

A R Sahil "Aleeg"

निकलने को न जाने दिल से जाँ क्या क्या नहीं निकला
नहीं निकला तो बस इक इश्क़ और शहर-ए-मुज़फ़्फ़रपुर

A R Sahil "Aleeg"

हम ने देखा है हुस्न का दरिया
रोज़ सौ कश्तियाँ डुबोता है

जिस को मिल जाए इश्क़ में 'साहिल'
सच में वो ख़ुश-नसीब होता है

A R Sahil "Aleeg"

अक्स किरदार का भी दिखता है
आप समझे न महज़ लफ़्ज़ इसे

A R Sahil "Aleeg"

मेरे इश्क़ का क़त्ल कर ख़ुश है 'साहिल'
यही थी तेरे दिल की हसरत मुबारक

A R Sahil "Aleeg"

जहाँ भर में यकदम से मैं छा गया हूँ
किया इश्क़ बर्बाद हज़रत मुबारक

A R Sahil "Aleeg"

मेरे हाल पर सब उछल कर ये बोले
तुम्हें इश्क़ और ये मोहब्बत मुबारक

A R Sahil "Aleeg"

हुए हैं इश्क़ में बदनाम इतने हम 'साहिल'
हमारा नाम यहाँ रोज़ ही ख़बर में है

A R Sahil "Aleeg"

कहाँ कितना हुआ बर्बाद मैं इश्क़-ओ-मोहब्बत में
मैं माज़ी के झरोखों से ये जा कर देख लेता हूँ

A R Sahil "Aleeg"

क़फ़स से इश्क़ है जिन को अलग वो रह नहीं सकते
मगर फिर भी परिंदों को उड़ा कर देख लेता हूँ

A R Sahil "Aleeg"

सभी के वास्ते मुमकिन नहीं है इश्क़ में यह
वो दिल जलाए जिसे दिल जलाना आता है

A R Sahil "Aleeg"

इश्क़ के मारे हो तुम तुम को पता ही होगा
बेवफ़ाई के ये नश्तर नहीं देखे जाते

A R Sahil "Aleeg"

हमें मालूम था इस इश्क़ में ऐसा ही होता है
किसी पर जाँ छिड़कते हैं किसी से दिल लगाते हैं

A R Sahil "Aleeg"

जो ज़ाए हो गए सो हो गए उन पर गिरा दो ख़ाक
मगर अब इश्क़ में कोई भी आँसू मत गिरा देना

A R Sahil "Aleeg"

डर से घर से बाहर कब जाते हैं हम
एक्सीडेंट करा देता है इश्क़ हमें

A R Sahil "Aleeg"

कोई बस्ती कोई जज़ीरा नहीं
इश्क़ का ख़ूब ही नज़ारा है

साहिल-ए-इश्क़ पर हुआ मालूम
इश्क़ की नाव बेसहारा है

A R Sahil "Aleeg"

मुझ पर ये ज़ुल्म-ए-हुस्न कोई कम नहीं यहाँ
बोसे की ख़्वाहिशात शिकायत के साथ साथ

इस आशिक़ी ने मुझ को सुख़न-वर बना दिया
मैं शेर कह रहा हूँ मुहब्बत के साथ साथ

A R Sahil "Aleeg"

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