जब मुक़द्दर में फ़ना होना लिखा ही है
हर्ज क्या है फिर बिखर कर ख़ाक होने में
सहने वाले को गर सब्र आ जाए तो फिर समझो
कहने वालों की औक़ात फ़क़त दो कौड़ी की है
मुझे कहना बहुत कुछ, पूछना भी है बहुत कुछ
मगर अब कहने सुनने को बचा भी कुछ नहीं है
मुझको दुनिया जहाँ की दौलत नहीं चाहिए हाफ़िद
हम तो बस साथ तेरे ही ज़िंदगी की दुआ लेंगे
बेवफ़ाई की तुमने जाँ, और सज़ा ख़ुद को देता हूँ
चाय, सिगरेट और गाँजा से जलाता हूँ इस दिल को
ख़र्च कर दें जिसे वो ही दौलत असल रिज़्क़ है
वो नहीं है, जिसे आप रखते तिजोरी में हैं
मरीज़-ए- इश्क़ से उसका हाल मत पूछा करो तुम
तबस्सुम लब-कुशा लहजा, झूठ होगा ठीक ही हूँ
इश्क़ इकलौती वो मज़हब है जिसके उम्मती यहाँ
बेवफ़ा की भी इबादत करते है ता-दम-ए-पसीं
न कर पाया ख़ुदा को जब मैं राज़ी फिर बता मुझको
करूंँगा क्या? ले कर शोहरत ये दौलत या वो लड़की अब