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Ghaus Khah makhah Hyderabadi

Top 10 of Ghaus Khah makhah Hyderabadi

Ghaus Khah makhah Hyderabadi

Top 10 of Ghaus Khah makhah Hyderabadi

    ग़म-ए-मुसलसल की इस तपिश में कि जिस्म जल जाए आदमी का
    हँसी की हल्की फुवार भी हो तो काम चल जाए आदमी का

    मज़े की गर ज़रा भी हिस है न हँसी को और क़हक़हे को छोड़ो
    चमन में गर फूल मुस्कुरा दे तो दिल बहल जाए आदमी का

    मुसीबतों का मुक़ाबला जो हमेशा हँसते हुए करेगा
    जो वक़्त-ए-मुश्किल है आने वाला तो वो भी टल जाए आदमी का

    किसी को गिरने से टोकना मत दुरुश्त लहजे में याद रखो
    तबस्सुम-आमेज़ हो नसीहत क़दम सँभल जाए आदमी का

    ज़माना अच्छा गुज़र गया तो ये दिन बुरे भी नहीं रहेंगे
    न हो अगर ये क़रीब पैहम तो दम निकल जाए आदमी का

    गुनाहगारों और आसियों को अज़ाब-ए-दोज़ख़ से वाइ'ज़ो तुम
    डराओ बे-शक मगर न इतना कि दिल दहल जाए आदमी का

    इबादतों के मुआवज़े में मिलेगी जो आबिदों को जन्नत
    तुम उस का नक़्शा कुछ ऐसा खींचो कि दिल फिसल जाए आदमी का

    नज़्अ' से पहले करे जो तौबा वो अपनी रहमत से बख़्श देगा
    अजब नहीं है कि मरते दम भी दिल बदल जाए आदमी का

    ये दौर मेक-अप का आ गया है वो हुस्न-ए-सादा कहाँ मिले अब
    कि जिस की बस इक झलक को देखे तो दिल मचल जाए आदमी का

    फ़ज़ा-ए-मस्मूँ में साँस ले कर कोई जिया भी तो क्या करेगा
    ज़ईफ़ होने से क़ब्ल ही जब शबाब ढल जाए आदमी का

    न इतनी आसान शाइ'री हो कि जिस का मफ़्हूम ही न निकले
    न इतनी मुश्किल कि जिस को सुन कर ज़ेहन पिघल जाए आदमी का

    ये ज़िंदगी 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' इतनी अज़ाब-ए-जाँ और तवील भी है
    अगर न हों महफ़िलें हँसी की तो दम निकल जाए आदमी का
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    मिरे दिल में अचानक ये ख़याल आया
    ज़राफ़त की ज़मीं बंजर पड़ी है
    मैं इस की आब्यारी कर के देखूँ
    ज़रा नम हो तो शायद ये बहुत ज़रख़ेज़ हो जाए
    ये मेरी अर्क़-रेज़ी से तो कुछ नम हो गई है
    अब इस बंजर ज़मीं में ख़्वाह-म-ख़्वाह में
    तबस्सुम के जो थोड़े बीज बोए जा रहा हूँ
    कल इन में से हँसी की
    नन्ही कोंपलें हँस हँस के फूटेंगी
    फिर इन ही कोंपलों में
    क़हक़हों के फूल आएँगे
    कुछ ऐसे फूल भी थे
    जो खिला करते थे पहले भी
    मगर वाक़िफ़ न थे
    ख़ुद अपनी भीनी भीनी ख़ुशबू से
    सलीक़ा सीख जाएगी हवा भी धीरे धीरे
    कि कैसे चूमते हैं
    अध-खिली कलियों को फूलों को
    चमन में बुलबुलों का और भंवरो ही का राज होगा
    इजाज़त ही न होगी दाख़िले की तब बगूलों को
    चलेगी जब हवा शेर-ओ-सुख़न की
    हँसी और क़हक़हों के फूल अपने सर हिला कर
    कुछ इस अंदाज़ से वो दाद देंगे अहल-ए-फ़न को
    फ़ज़ा में भीनी भीनी उन की ख़ुशबू फैल जाएगी
    और इस तरह ज़राफ़त की वही बंजर ज़मीं भी
    इक हँसते खिलखिलाते और ख़ुशबू से मोअ'त्तर
    सरासर ख़ित्ता-ए-सरसब्ज़-ओ-शादाब बन कर
    दुखी आज़ुर्दा-ख़ातिर ग़म के मारों को
    हँसी और क़हक़हों की ने'मतों से
    सब को माला-माल कर देगी
    इसी तरह जहाँ तक हो सकेगा
    मसर्रत और ख़ुशी के गीत नग़्में
    मिला कर उन के सुर में अपना सुर गाऊँगा मैं भी
    सवाब-ए-जारिया पाऊँगा मैं भी
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    न अब मैं प्यार कर सकता हूँ और न डाँट सकता हूँ
    जो बाक़ी रह गए हैं दिन उन्हें बस काट सकता हूँ

    जो मिल जाए उसी पर इक्तिफ़ा करना ही पड़ता है
    कोई शय अपनी मर्ज़ी से न अब में छाँट सकता हूँ

    हुआ हूँ जब से पेंशन-याफ़ता ये हाल है यारो
    न कोई क़र्ज़ देता है न पेंशन बाँट सकता हूँ

    यही क्या कम है ख़ुद-मुख़्तार हूँ मैं जब भी जी चाहे
    तमन्नाओं के पर उड़ने से पहले काट सकता हूँ

    मैं अपने वक़्त के हाथों में हूँ जैसे छटी उँगली
    न इस्ति'माल कर सकता हूँ और न काट सकता हूँ

    ग़मों की ख़ैर टेढ़ी ही नहीं गाढ़ी भी होती है
    न पी जाती है ये और न उसे मैं चाट सकता हूँ

    उड़ा कर देख ले कोई पतंगें अपनी शेख़ी की
    बुलंदी पर अगर हूँ भी तो कन्ने काट सकता हूँ

    यही तौफ़ीक़ क्या कम है कि रौनक़ को हँसा कर मैं
    दुखों का बोझ कम करने ग़मों को बाँट सकता हूँ

    ख़लीज-ए-बुग़्ज़-ओ-नफ़रत गर दिलों में हो गई पैदा
    उसे मैं 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' हँसते-हँसाते पाट सकता हूँ
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    कभी जब ख़ुद से घबराता है सूरज
    टहल कर जी को बहलाता है सूरज

    तपिश जब हद से बढ़ती है बदन की
    समुंदर में उतर जाता है सूरज

    मिटाने भूक अपनी मुँह अंधेरे
    अँधेरों को निगल जाता है सूरज

    सवेरे बदलियाँ जब छेड़ती हैं
    तुलूअ''' होने से शरमाता है सूरज

    सर-ए-मग़रिब बुझा देता है ख़ुद को
    सुब्ह होते ही जल जाता है सूरज

    ज़मीं को रौशनी देने न जाने
    कहाँ से रौशनी पाता है सूरज

    महीनों तक कहीं रू-पोश रह कर
    ज़मीं पर बर्फ़ बर्फ़ाता है सूरज

    कभी ऐसा भी होता है ज़मीं पर
    महीनों आग बरसाता है सूरज

    सवेरे 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' मुझ को उठाने
    मिरी खिड़की में आ जाता है सूरज
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    रात-भर इक़रार की बातें करो
    सुब्ह-दम इनकार की बातें करो

    उलझनें दिल की बढ़ानी हों अगर
    गेसू-ए-ख़मदार की बातें करो

    हैं निगाहें सैर और अबरू कमाँ
    यार बा-हथियार की बातें करो

    मह-वशो इतने बुरे भी हम नहीं
    आओ हम से प्यार की बातें करो

    सिर्फ़ पहली ही के दिन ऐ दोस्तो
    साज़ और झंकार की बातें करो

    दूसरी को बच गए पैसे अगर
    कूचा-ओ-बाज़ार की बातें करो

    दस तलक चिल्लर अगर बाक़ी रहे
    चाय पर अख़बार की बातें करो

    बीस और इक्कीस को अहबाब से
    चर्ख़-ए-ना-हंजार की बातें करो

    क़र्ज़-ए-हसना ले के तुम उनतीस तक
    घर के कारोबार की बातें करो

    तीस को बातें करो इकतीस की
    या दिल-ए-बीमार की बातें करो

    आख़िरी दिन ख़ूब ग़ुस्से में रहो
    हुज्जत-ओ-तकरार की बातें करो

    फिर उसी शब सुब्ह की उम्मीद में
    मीठी मीठी प्यार की बातें करो

    तुम से ये किस ने कहा था 'ख़्वाह-म-ख़्वाह'
    इस तरह बे-कार की बातें करो
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    जब हसीनों की तसावीर किताबों में मिलें
    कोरे काग़ज़ ही सवालों के जवाबों में मिलें

    दिन को थेटर में मिलें रात को बाग़ों में मिलें
    मिल ने वाले जो मिलें कुछ तो हिजाबों में मिलें

    चाहने वालों का इस तरह चमन में हो मिलन
    जिस तरह फूल चम्बेली के गुलाबों में मिलें

    ना मैं दूल्हा हूँ नया और न नई दूल्हन तुम
    दोनों बूढ़े हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

    उम्र बढ़ती है तो जज़्बों में कमी होती है
    मुर्ग़-ओ-माही के मज़े कैसे कबाबों में मिलें

    इसी उम्मीद पे मयख़ाने के चक्कर काटे
    शायद अब अच्छे भले लोग ख़राबों में मिलें

    वस्ल का लुत्फ़ शब-ए-हिज्र के मारे यूँ लें
    नींद आ जाए जो दोनों को तो ख़्वाबों में मिलें

    जिन सवाबों के भरोसे पे है ज़िंदा वाइज़
    हमें शायद वो गुनाहों के अज़ाबों में मिलें

    वाइज़-ओ-रिंद अगर शीर-ओ-शकर हो जाएँ
    ज़ाइक़े पंद-ओ-नसीहत के शराबों में मिलें

    'ख़्वाह-म-ख़्वाह' मिलने से कतराते हो जिन से दिन में
    क्या करोगे जो तुम्हें रात को ख़्वाबों में मिलें
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    न ये ज़मीं हमारी न आसमाँ हमारा
    दोज़ख़ से कम नहीं है जन्नत-निशाँ हमारा
    सुनना पड़ेगा सब को अब तो बयाँ हमारा
    हिन्दोस्ताँ के हम हैं हिन्दोस्ताँ हमारा

    जनता पे राज करती है डाकुओं की टोली
    वो बच गए जुनूँ से खेली थी ख़ूँ की होली
    मासूम शहरियों पे जिस ने चलाई गोली
    वो संतरी बना है अब पासबाँ हमारा

    ग़ैरों से हम ने सीखा अपनों को ग़ैर रखना
    नामूस ही हरम का न पास-ए-दैर रखना
    मज़हब ही जब सिखाए आपस में बैर रखना
    बाक़ी रहेगा कैसे नाम-ओ-निशाँ हमारा

    मक़्तूल क्या बताए है कौन उस का क़ातिल
    कब जाने ख़त्म होगी ये जंग-ए-हक़-ओ-बातिल
    हुब्ब-ए-वतन हमारे ईमान में है शामिल
    मुस्लिम हैं हम वतन है सारा जहाँ हमारा

    रौशन हुई हैं शमएँ हम से ही अंजुमन में
    ग़ुंचे खिलाए हम ने सहरा में और बन में
    ऐ बाग़बाँ बता तू इतने बड़े चमन में
    क्या हर्ज है रहे गर इक आशियाँ हमारा

    हम ने भी ख़ून दे कर सींचा है इस चमन को
    सर से बँधा है अब भी खोला नहीं कफ़न को
    कहते हैं आस कोई हम से नहीं वतन को
    है कोई दूर कर दे वहम-ओ-गुमाँ हमारा

    गो कारवाँ हमारा आमादा-ए-सफ़र है
    रस्ते में लुट न जाए हर शख़्स को ये डर है
    रहज़न बना है रहबर और राह पुर-ख़तर है
    मंज़िल पे कैसे पहुँचेगा कारवाँ हमारा

    पगडंडियों पे चलते हैं रहगुज़र नहीं है
    तन्हा हैं उन का कोई भी हम-सफ़र नहीं है
    हम शाइ'रों को देखो रहने को घर नहीं है
    लिखते हैं शाइ'री में सारा जहाँ हमारा

    इज़्ज़त-ओ-आबरू से जीने का अज़्म कर लें
    अपने वतन पे क़ुर्बां होने का अज़्म कर लें
    मौत आ गई तो हंस कर मरने का अज़्म कर लें
    कब तक रहेगा आख़िर दिल ना-तवाँ हमारा

    जब से हुआ है दरहम-बरहम निज़ाम अपना
    कोई नहीं जहाँ में क़ाएम-मक़ाम अपना
    सब के दिलों में यारो अब है क़ियाम अपना
    समझो हमें वहीं अब दिल है जहाँ हमारा

    जीना यहाँ सज़ा है अब और हम कहें क्या
    गंदी फ़ज़ा में कब तक मर मर के हम जिएँ क्या
    चीन-ओ-अरब को ले कर हम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' करें क्या
    काफ़ी है बस रहे गर हिन्दोस्ताँ हमारा
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    बेगम से कहा हम ने जो फ़ुर्सत है आप को
    पतलून में हमारी बटन एक टाँक दो

    ग़ुस्से से बोलीं आप ही ख़ुद टाँक लें जनाब
    बीवी का जब मज़ाक़ उड़ाते रहे हैं आप

    बीवी बग़ैर आदमी होते नहीं पूरे
    मैं न रहूँ तो आप भी रह जाएँ अधूरे

    यूँ तो बटन का टाँकना छोटा सा काम है
    ये काम भी तो लाएक़-ए-सद-एहतिराम है

    मर्दांगी की शान न इतनी बघारिए
    सूई में सिर्फ़ धागा पिरो कर दिखाए

    पतलून में जो आप बटन ख़ुद लगाएँगे
    उँगली चुभो के सूई में ख़ूँ में नहाएँगे

    सोचो बटन बग़ैर जो पतलून पहनते
    पतलून फिसलती तो क्या सब लोग न हँसते

    पतलून में तुम्हारी बटन कौन टाँकती
    दुनिया में तुम बताओ जो औरत ही न होती

    हम ने कहा कि अपनी बड़ाई न हाँकिए
    छोटी सी है ये बात न आगे बढ़ाइए

    पतलून में बस एक बटन टाँकने का था
    पतलून को बटन में नहीं टाँकने का था

    ग़ुस्से को थूक दीजे मेरी बात मानिए
    खाई में यूँ बहस की ख़ुदारा न झाँकिए

    गर इस बहस का ख़ात्मा होना ज़रूर है
    जो बात सच है आप को सुनना ज़रूर है

    औरत अगर न होती तो जन्नत ही में रहते
    दुनिया में आ के इस तरह दुख-दर्द न सहते

    शादी ब्याह का हमें ख़तरा भी न होता
    सिर्फ़ इक बटन को टाँकने का नख़रा भी न होता

    बीवी या उस की बहन हो या हो किसी की सास
    तुम हो इसी लिए तो पहनते हैं हम लिबास

    मर्दों को अगर दुनिया में औरत ही न होती
    पतलून पहनने की ज़रूरत ही न होती
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    मैं ने पूछा कि ये क्या हाल बना रखा है
    न तो मेक-अप है न बालों को सजा रखा है

    छेड़ती रहती हैं अक्सर लब-ओ-रुख़सारों को
    तुम ने ज़ुल्फ़ों को बहुत सर पे चढ़ा रखा है

    मुस्कुराते हुए उस ने ये कहा शोख़ी से
    एक दीवाने ने दीवाना बना रखा है

    जेब ग़ाएब है तो नेफ़ा है बटन के बदले
    तुम ने पतलून का पाजामा बना रखा है

    मशरिक़ी रेहन-सहन चाल-ओ-चलन मग़रिब का
    हम ने तहज़ीब का शीर-ख़ुर्मा बना रखा है

    गर सिला दोगे मुझे मेरी वफ़ाओं के एवज़
    माँग लूँगा तुम्हें इनआ'म में क्या रखा है

    जो सभी देख चुके हम वो नहीं देखेंगे
    वो दिखाओ हमें जो सब से छुपा रखा है

    उन को अग़्यार मोहब्बत से लगाते हैं गले
    मुझ को अपनों ने भी बेगाना बना रखा है

    ज़िंदगी मौत की तम्हीद है पर लोगों ने
    मुख़्तसर बात का अफ़्साना बना रखा है

    लोग भूलें न कभी ऐसा तख़ल्लुस रखिए
    नाम तो नाम है बस नाम में क्या रखा है

    क़ाफ़िए और रदीफ़ों-ओ-तख़ल्लुस के सिवा
    'ख़्वाह-म-ख़्वाह' आप के अश'आर में क्या रखा है
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    Ghaus Khah makhah Hyderabadi
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    सिफ़ारिश की ज़रूरत ही न होती
    नवाज़िश की ज़रूरत ही न होती

    अगर आता हमें हक़ छीन लेना
    गुज़ारिश की ज़रूरत ही न होती

    अगर सूखे कुएँ शबनम से भरते
    तो बारिश की ज़रूरत ही न होती

    नहीं आते अगर दुनिया में हम तो
    रिहाइश की ज़रूरत ही न होती

    हसीनों का जो होता हुस्न सादा
    नुमाइश की ज़रूरत ही न होती

    अगर होता न शौक़-ए-ख़ुद-सनाई
    सताइश की ज़रूरत ही न होती

    सियासत-दाँ जो तब्ई मौत मरते
    तो साज़िश की ज़रूरत ही न होती

    अगर तुम 'ख़्वाह-म-ख़्वाह' करते क़नाअ'त
    तो ख़्वाहिश की ज़रूरत ही न होती
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