क्या ज़रूरी है मुहब्बत में तमाशा होना
जिससे मिलना ही नहीं उससे जुदा क्या होना
ज़िंदा होना तो नहीं हिज्र में ज़िंदा होना
हम इसे कहते हैं होने के अलावा होना
तेरा सूरज के क़बीले से त'अल्लुक़ तो नहीं
ये कहाँ से तुझे आया है सभी का होना
तूने आने में बहुत देर लगा दी वरना
मैं नहीं चाहता था हिज्र में बूढ़ा होना
क्या तमाशा है कि सब मुझको बुरा कहते हैं
और सब चाहते हैं मेरी तरह का होना
तू समझता है तेरा हिज्र गवारा कर के
बैठ जाएँगे मोहब्बत से किनारा कर के
ख़ुदकुशी करने नहीं दी तेरी आँखों ने मुझे
लौट आया हूँ मैं दरिया का नज़ारा कर के
जी तो करता है उसे पाँव तले रौंदने को
छोड़ देता हूँ मुक़द्दर का सितारा कर के
करना हो तर्क-ए-त'अल्लुक़ तो कुछ ऐसे करना
हम को तकलीफ़ न हो ज़िक्र तुम्हारा कर के
इसलिए उसको दिलाता हूँ मैं ग़ुस्सा 'ताबिश'
ताकि देखूँ मैं उसे और भी प्यारा कर के
दश्त में प्यास बुझाते हुए मर जाते हैं
हम परिंदे कहीं जाते हुए मर जाते हैं
हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस
जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं
घर पहुँचता है कोई और हमारे जैसा
हम तेरे शहर से जाते हुए मर जाते हैं
किस तरह लोग चले जाते हैं उठ कर चुप -चाप
हम तो ये ध्यान में लेट हुए मर जाते हैं
उन के भी क़त्ल का इल्ज़ाम हमारे सर है
जो हमें ज़हर पिलाते हुए मर जाते हैं
ये मोहब्बत की कहानी नहीं मरती लेकिन
लोग किरदार निभाते हुए मर जाते हैं
हम हैं वो टूटी हुई कश्तियों वाले 'ताबिश '
जो किनारों को मिलाते हुए मर जाते हैं