Unknown

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    कितने दिलों को तोड़ती है कमबख़्त फरवरी
    यूँ ही नहीं किसी ने इसके दिन घटाए हैं

    Unknown
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    ये दुनिया ग़म तो देती है शरीक-ए-ग़म नहीं होती
    किसी के दूर जाने से मोहब्बत कम नहीं होती

    Unknown
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    ज़िंदगी कहते हैं जिस को चार दिन की बात है
    बस हमेशा रहने वाली इक ख़ुदा की ज़ात है

    Unknown
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    मुनाफ़िक़ दोस्तों से लाख बेहतर हैं ख़ुदा दुश्मन
    कि ग़द्दारी नवाबों से हुकूमत छीन लेती है

    Unknown
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    जिन के किरदार से आती हो सदाक़त की महक
    उन की तदरीस से पत्थर भी पिघल सकते हैं

    Unknown
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    या रब मिरी दुआओं में इतना असर रहे
    फूलों भरा सदा मिरी बहना का घर रहे

    Unknown
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    ये सोच कर के वो खिड़की से झाँक ले शायद
    गली में खेलते बच्चे लड़ा दिये मैंने

    Unknown
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    लोग काँटों से बच के चलते हैं
    मैं ने फूलों से ज़ख़्म खाए हैं

    Unknown
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    इस दौर-ए-सियासत का इतना सा फ़साना है
    बस्ती भी जलानी है मातम भी मनाना है

    Unknown
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    मैंने उसको इतना देखा जितना देखा जा सकता था
    लेकिन फिर भी दो आँखों से कितना देखा जा सकता था

    Unknown
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