फिर मिरे सर पे कड़ी धूप की बौछार गिरी
मैं जहाँ जा के छुपा था वहीं दीवार गिरी
लोग क़िस्तों में मुझे क़त्ल करेंगे शायद
सब से पहले मिरी आवाज़ पे तलवार गिरी
और कुछ देर मिरी आस न टूटी होती
आख़िरी मौज थी जब हाथ से पतवार गिरी
अगले वक़्तों में सुनेंगे दर-ओ-दीवार मुझे
मेरी हर चीख़ मिरे अहद के उस पार गिरी
ख़ुद को अब गर्द के तूफ़ाँ से बचाओ 'क़ैसर'
तुम बहुत ख़ुश थे कि हम-साए की दीवार गिरी
तुम्हारे शहर का मौसम बड़ा सुहाना लगे
मैं एक शाम चुरा लूँ अगर बुरा न लगे
तुम्हारे बस में अगर हो तो भूल जाओ मुझे
तुम्हें भुलाने में शायद मुझे ज़माना लगे
जो डूबना है तो इतने सुकून से डूबो
कि आस-पास की लहरों को भी पता न लगे
वो फूल जो मिरे दामन से हो गए मंसूब
ख़ुदा करे उन्हें बाज़ार की हवा न लगे
न जाने क्या है किसी की उदास आँखों में
वो मुँह छुपा के भी जाए तो बेवफ़ा न लगे
तू इस तरह से मिरे साथ बेवफ़ाई कर
कि तेरे बा'द मुझे कोई बेवफ़ा न लगे
तुम आँख मूँद के पी जाओ ज़िंदगी 'क़ैसर'
कि एक घूँट में मुमकिन है बद-मज़ा न लगे
टूटे हुए ख़्वाबों की चुभन कम नहीं होती
अब रो के भी आंखों की जलन कम नहीं होती
कितने भी घनेरे हों तिरी ज़ुल्फ़ के साए
इक रात में सदियों की थकन कम नहीं होती
होंटों से पिएंचाहे निगाहों से चुराएं
ज़ालिम तिरी ख़ुशबू-ए-बदन कम नहीं होती
मिलना है तो मिल जाओ यहीं हश्र में क्या है
इक उम्र मिरे वादा-शिकन कम नहीं होती
'क़ैसर' की ग़ज़ल से भी न टूटी ये रिवायत
इस शहर में ना-क़दरी-ए-फ़न कम नहीं होती