क्या ज़रूरी है मुहब्बत में तमाशा होना
जिस से मिलना ही नहीं उस से जुदा क्या होना
ज़िंदा होना तो नहीं हिज्र में ज़िंदा होना
हम इसे कहते हैं होने के अलावा होना
तेरा सूरज के क़बीले से तअल्लुक़ तो नहीं
ये कहाँ से तुझे आया है सभी का होना
तू ने आने में बहुत देर लगा दी वरना
मैं नहीं चाहता था हिज्र में बूढ़ा होना
क्या तमाशा है कि सब मुझ को बुरा कहते हैं
और सब चाहते हैं मेरी तरह का होना
— Abbas Tabish















