जब हसीनों की तसावीर किताबों में मिलें

कोरे काग़ज़ ही सवालों के जवाबों में मिलें

दिन को थेटर में मिलें रात को बाग़ों में मिलें
मिल ने वाले जो मिलें कुछ तो हिजाबों में मिलें

चाहने वालों का इस तरह चमन में हो मिलन
जिस तरह फूल चम्बेली के गुलाबों में मिलें

ना मैं दूल्हा हूँ नया और न नई दूल्हन तुम
दोनों बूढ़े हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

उम्र बढ़ती है तो जज़्बों में कमी होती है
मुर्ग़-ओ-माही के मज़े कैसे कबाबों में मिलें

इसी उम्मीद पे मयख़ाने के चक्कर काटे
शायद अब अच्छे भले लोग ख़राबों में मिलें

वस्ल का लुत्फ़ शब-ए-हिज्र के मारे यूँ लें
नींद आ जाए जो दोनों को तो ख़्वाबों में मिलें

जिन सवाबों के भरोसे पे है ज़िंदा वाइज़
हमें शायद वो गुनाहों के अज़ाबों में मिलें

वाइज़-ओ-रिंद अगर शीर-ओ-शकर हो जाएँ
ज़ाइक़े पंद-ओ-नसीहत के शराबों में मिलें

'ख़्वाह-म-ख़्वाह' मिलने से कतराते हो जिन से दिन में
क्या करोगे जो तुम्हें रात को ख़्वाबों में मिलें

— Ghaus Khah makhah Hyderabadi

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