Ahmad Faraz

Top 10 of Ahmad Faraz

    किस तरफ़ को चलती है अब हवा नहीं मालूम
    हाथ उठा लिए सबने और दुआ नहीं मालूम

    मौसमों के चेहरों से ज़र्दियाँ नहीं जाती
    फूल क्यूँ नहीं लगते ख़ुश-नुमा नहीं मालूम

    रहबरों के तेवर भी रहज़नों से लगते हैं
    कब कहाँ पे लुट जाए क़ाफ़िला नहीं मालूम

    सर्व तो गई रुत में क़ामतें गँवा बैठे
    क़ुमरियाँ हुईं कैसे बे-सदा नहीं मालूम

    आज सब को दावा है अपनी अपनी चाहत का
    कौन किस से होता है कल जुदा नहीं मालूम

    मंज़रों की तब्दीली बस नज़र में रहती है
    हम भी होते जाते हैं क्या से क्या नहीं मालूम

    हम 'फ़राज़' शे'रों से दिल के ज़ख़्म भरते हैं
    क्या करें मसीहा को जब दवा नहीं मालूम
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    Ahmad Faraz
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    ज़िंदगी से यही गिला है मुझे
    तू बहुत देर से मिला है मुझे

    तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल
    हार जाने का हौसला है मुझे

    दिल धड़कता नहीं टपकता है
    कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे

    हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं
    इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे

    कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़'
    सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे
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    Ahmad Faraz
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    सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं
    सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

    सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से
    सो अपने आप को बर्बाद कर के देखते हैं

    सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की
    सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं

    सुना है उस को भी है शे'र ओ शा'इरी से शग़फ़
    सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं

    सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं
    ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

    सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है
    सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं

    सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं
    सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

    सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें
    सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं

    सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की
    सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं

    सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है
    सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं

    सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं
    सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं

    सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की
    जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं

    सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में
    मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं

    सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में
    पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं

    सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है
    कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं

    वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं
    कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

    बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का
    सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं

    सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त
    मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं

    रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं
    चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं

    किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे
    कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं

    कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही
    अगर वो ख़्वाब है ता'बीर कर के देखते हैं

    अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ
    'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं
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    Ahmad Faraz
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    अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें
    जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

    ढूँढ़ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
    ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

    ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो
    नशा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

    तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा
    दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

    आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर
    क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

    अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'
    जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें
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    Ahmad Faraz
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    रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ
    आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

    कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख
    तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ

    पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो
    रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ

    किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
    तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ

    इक उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम
    ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ

    अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़हम को तुझ से हैं उम्मीदें
    ये आख़िरी शमएँ भी बुझाने के लिए आ
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    Ahmad Faraz
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    "भली सी एक शक्ल थी"
    भले दिनों की बात है
    भली सी एक शक्ल थी
    न ये कि हुस्न-ए-ताम हो
    न देखने में आम सी
    न ये कि वो चले तो कहकशाँ सी रहगुज़र लगे
    मगर वो साथ हो तो फिर भला भला सफ़र लगे

    कोई भी रुत हो उस की छब
    फ़ज़ा का रंग-रूप थी
    वो गर्मियों की छाँव थी
    वो सर्दियों की धूप थी

    न मुद्दतों जुदा रहे
    न साथ सुब्ह-ओ-शाम हो
    न रिश्ता-ए-वफ़ा पे ज़िद
    न ये कि इज़्न-ए-आम हो

    न ऐसी ख़ुश-लिबासियाँ
    कि सादगी गिला करे
    न इतनी बे-तकल्लुफ़ी
    कि आइना हया करे

    न इख़्तिलात में वो रम
    कि बद-मज़ा हों ख़्वाहिशें
    न इस क़दर सुपुर्दगी
    कि ज़च करें नवाज़िशें
    न आशिक़ी जुनून की
    कि ज़िंदगी अज़ाब हो
    न इस क़दर कठोर-पन
    कि दोस्ती ख़राब हो

    कभी तो बात भी ख़फ़ी
    कभी सुकूत भी सुख़न
    कभी तो किश्त-ए-ज़ाफ़राँ
    कभी उदासियों का बन

    सुना है एक उम्र है
    मुआमलात-ए-दिल की भी
    विसाल-ए-जाँ-फ़ज़ा तो क्या
    फ़िराक़-ए-जाँ-गुसिल की भी

    सो एक रोज़ क्या हुआ
    वफ़ा पे बहस छिड़ गई
    मैं इश्क़ को अमर कहूँ
    वो मेरी ज़िद से चिड़ गई

    मैं इश्क़ का असीर था
    वो इश्क़ को क़फ़स कहे
    कि उम्र भर के साथ को
    वो बद-तर-अज़-हवस कहे

    शजर हजर नहीं कि हम
    हमेशा पा-ब-गिल रहें
    न ढोर हैं कि रस्सियाँ
    गले में मुस्तक़िल रहें

    मोहब्बतों की वुसअतें
    हमारे दस्त-ओ-पा में हैं
    बस एक दर से निस्बतें
    सगान-ए-बा-वफ़ा में हैं

    मैं कोई पेंटिंग नहीं
    कि इक फ़्रेम में रहूँ
    वही जो मन का मीत हो
    उसी के प्रेम में रहूँ

    तुम्हारी सोच जो भी हो
    मैं उस मिज़ाज की नहीं
    मुझे वफ़ा से बैर है
    ये बात आज की नहीं

    न उस को मुझ पे मान था
    न मुझ को उस पे ज़ोम ही
    जो अहद ही कोई न हो
    तो क्या ग़म-ए-शिकस्तगी
    सो अपना अपना रास्ता
    हँसी-ख़ुशी बदल दिया
    वो अपनी राह चल पड़ी
    मैं अपनी राह चल दिया

    भली सी एक शक्ल थी
    भली सी उस की दोस्ती
    अब उस की याद रात दिन
    नहीं, मगर कभी कभी
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