नहीं हर चंद किसी गुम-शुदा जन्नत की तलाश
    इक न इक ख़ुल्द-ए-तरब-नाक का अरमाँ है ज़रूर

    बज़्म-ए-दोशंबा की हसरत तो नहीं है मुझ को
    मेरी नज़रों में कोई और शबिस्ताँ है ज़रूर

    Asrar Ul Haq Majaz
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    ये क़त्ल-ए-आम और बे-इज़्न क़त्ल-ए-आम क्या कहिए
    ये बिस्मिल कैसे बिस्मिल हैं जिन्हें क़ातिल नहीं मिलता

    वहाँ कितनों को तख़्त ओ ताज का अरमाँ है क्या कहिए
    जहाँ साइल को अक्सर कासा-ए-साइल नहीं मिलता

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    फिर किसी के सामने चश्म-ए-तमन्ना झुक गई
    शौक़ की शोख़ी में रंग-ए-एहतराम आ ही गया

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    इश्क़ को पूछता नहीं कोई
    हुस्न का एहतिराम होता है

    Asrar Ul Haq Majaz
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    हुस्न को शर्मसार करना ही
    इश्क़ का इंतिक़ाम होता है

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    इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है
    हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए

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    बख़्शी हैं हम को इश्क़ ने वो जुरअतें 'मजाज़'
    डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम

    Asrar Ul Haq Majaz
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    बताऊँ क्या तुझे ऐ हम-नशीं किस से मोहब्बत है
    मैं जिस दुनिया में रहता हूँ वो इस दुनिया की औरत है

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    जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
    मगर वो आज भी बरहम नहीं है

    बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
    तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है

    बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में
    ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है

    तक़ाज़े क्यूँ करूँ पैहम न साक़ी
    किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है

    उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त
    इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है

    मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो
    तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है

    अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं
    अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है

    ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस
    मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है

    'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन
    जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है

    Asrar Ul Haq Majaz
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    तेरे माथे पे ये आँचल बहुत ही ख़ूब है लेकिन
    तू इस आँचल से इक परचम बना लेती तो अच्छा था

    Asrar Ul Haq Majaz
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