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इश्क़ को पूछता नहीं कोई
हुस्न का एहतिराम होता है
हुस्न का एहतिराम होता है
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हुस्न को शर्मसार करना ही
इश्क़ का इंतिक़ाम होता है
इश्क़ का इंतिक़ाम होता है
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इश्क़ का ज़ौक़-ए-नज़ारा मुफ़्त में बदनाम है
हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए
हुस्न ख़ुद बे-ताब है जल्वा दिखाने के लिए
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बख़्शी हैं हम को इश्क़ ने वो जुरअतें 'मजाज़'
डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम
डरते नहीं सियासत-ए-अहल-ए-जहाँ से हम
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जुनून-ए-शौक़ अब भी कम नहीं है
मगर वो आज भी बरहम नहीं है
मगर वो आज भी बरहम नहीं है
बहुत मुश्किल है दुनिया का सँवरना
तिरी ज़ुल्फ़ों का पेच-ओ-ख़म नहीं है
बहुत कुछ और भी है इस जहाँ में
ये दुनिया महज़ ग़म ही ग़म नहीं है
तक़ाज़े क्यूँ करूँ पैहम न साक़ी
किसे याँ फ़िक्र-ए-बेश-ओ-कम नहीं है
उधर मश्कूक है मेरी सदाक़त
इधर भी बद-गुमानी कम नहीं है
मिरी बर्बादियों का हम-नशीनो
तुम्हें क्या ख़ुद मुझे भी ग़म नहीं है
अभी बज़्म-ए-तरब से क्या उठूँ मैं
अभी तो आँख भी पुर-नम नहीं है
ब-ईं सैल-ए-ग़म ओ सैल-ए-हवादिस
मिरा सर है कि अब भी ख़म नहीं है
'मजाज़' इक बादा-कश तो है यक़ीनन
जो हम सुनते थे वो आलम नहीं है
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