Subhan Asad

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    ये कांटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
    राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं

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    जब भी उस कूचे में जाना पड़ता है
    ज़ख्मों पर तेज़ाब लगाना पड़ता है

    उसके घर से दूर नहीं है मेरा घर
    रस्ते में पर एक ज़माना पड़ता है

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    उसने पूछा था पहले हाल मेरा
    फिर किया देर तक मलाल मेरा

    मैं वफ़ा को हुनर समझता था
    मुझपे भारी पड़ा कमाल मेरा

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    तुम्हें देखे ज़माना हो गया है
    नज़र महके ज़माना हो गया है

    बिछड़के तुमसे आँखें बुझ गयी हैं
    ये दिल धड़के ज़माना हो गया है

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    उसने ये कहके मुझे छोड़ दिया
    हाशिया छोड़ दिया जाता है

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    तू इस तरह से मिला फिर मलाल भी न रहा
    तेरे ख़याल में अपना ख़याल भी न रहा

    कुछ इस अदा से झुकी थी हया से आँख तेरी
    हमारी आँख में कोई सवाल भी न रहा

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    मैं एक ठहरा हुआ पुल, तू बहता दरिया है
    तुझे मिलूँगा तो फिर टूट कर मिलूँगा मै

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    रिश्तों की ये नाज़ुक डोरें तोड़ी थोड़ी जाती हैं,
    अपनी आँखे दुखती हों तो फोड़ी थोड़ी जाती हैं

    ये कांटे, ये धूप, ये पत्थर इनसे कैसा डरना है
    राहें मुश्किल हो जाएँ तो छोड़ी थोड़ी जाती हैं

    Subhan Asad
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    मैं जानता हूँ तेरी रूह की तलब जानाँ
    तुझे बदन की तरफ से नही छूउँगा मैं

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    गिला नहीं कि मेरे हाल पर हँसी दुनिया
    गिला तो ये है कि पहली हँसी तुम्हारी थी

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