Vipul Kumar

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    उस हिज्र पे तोहमत कि जिसे वस्ल की ज़िद हो
    उस दर्द पे ला'नत की जो अशआ'र में आ जाए

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    दिल भी अजीब ख़ाना-ए-वहदत-पसन्द था
    इस घर में या तो तू रहा या बेदिली रही

    उस ने तो यूँ ही पेड़ बनाया था रेत पर
    मिट्टी वहाँ हज़ार बरस तक हरी रही

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    उसे तो दौलत-ए-दुनिया भी कम भी पाने को
    मिरी तो ज़ात का मीज़ान भी ज़ियादा नहीं

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    तेरा प्यार मेरी ज़िंदगी में
    बहार ले कर आया है

    तेरे आने से पहले हर दिन
    पतझड़ हुआ करता था

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    फ़र्ज़-ए-सुपुर्दगी में तक़ाज़े नहीं हुए
    तेरे कहाँ से हों कि हम अपने नहीं हुए

    कुछ क़र्ज़ अपनी ज़ात के हो भी गए वसूल
    जैसे तिरे सुपुर्द थे वैसे नहीं हुए

    अच्छा हुआ कि हम को मरज़ ला-दवा मिला
    अच्छा नहीं हुआ कि हम अच्छे नहीं हुए

    उस के बदन का मूड बड़ा ख़ुश-गवार है
    हम भी सफ़र में उम्र से ठहरे नहीं हुए

    इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए
    और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए

    हम आ के तेरी बज़्म में बे-शक हुए ज़लील
    जितने गुनाहगार थे उतने नहीं हुए

    इस बार जंग उस से रऊनत की थी सो हम
    अपनी अना के हो गए उस के नहीं हुए

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    जल्द आएँ जिन्हें सीने से लगाना है मुझे
    फिर बदन और कहीं काम में लाना है मुझे

    इश्क़ पाँव से लिपटता है तो रुक जाता हूँ
    वर्ना तुम हो तो तुम्हें छोड़ के जाना है मुझे

    मेरे हाथों को ख़ुदा रक्खे तिरे जिस्म की ख़ैर
    मसअला ये है तुझे हाथ लगाना है मुझे

    दिल को धड़का सा लगा रहता है वो जान न ले
    और फिर जब्र तो ये है कि बताना है मुझे

    माँग लेता हूँ तिरे ग़म से ज़रा सरदारी
    एक दुनिया है जिसे दिल से उठाना है मुझे

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    कुछ इस लिए भी तेरी आरज़ू नहीं है मुझे
    मैं चाहता हूँ मेरा इश्क़ जावेदानी हो

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    हर मुलाक़ात पे सीने से लगाने वाले
    कितने प्यारे है मुझे छोड़ के जाने वाले

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    इक रोज़ खेल खेल में हम उस के हो गए
    और फिर तमाम उम्र किसी के नहीं हुए

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    उम्र गुज़री उसका चेहरा देखते
    और जी लेते तो दुनिया देखते

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