Liaqat Jafri

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    ये जो रह रह के सर-ए-दश्त हवा चलती है
    कितनी अच्छी है मगर कितना बुरा चलती है

    एक आसेब तआक़ुब में लगा रहता है
    मैं जो रुकता हूँ तो फिर उस की सदा चलती है

    हाए वो साँस कि रुकती है तो क्या रुकती है
    हाए वो आँख कि चलती है तो क्या चलती है

    पेश-ख़ेमा है किसी और नई वहशत का
    ये जो इतरा के अभी बाद-ए-सबा चलती है

    तीर चलते हैं लगातार सवाद-ए-जाँ में
    और तलवार कोई एक जुदा चलती है

    बीच दरिया के अजब जश्न बपा है यारो
    साथ कश्ती के कोई मौज-ए-बला चलती है

    आज कुछ और ही मंज़र है मिरे चारों तरफ़
    ग़ैर-महसूस तरीक़े से हवा चलती है

    मैं ब-ज़ाहिर तो हूँ आसूदा प मेरे अंदर
    धीमे धीमे से कहीं आह-ओ-बुका चलती है

    यूँ तो बेबाक बना फिरता है वो यारों में
    उस की आँखों में अजब शर्म-ओ-हया चलती है

    मेरे मौला जो रहे सिर्फ़ कहा तेरा रहे
    मेरे होंटों पे यही एक दुआ चलती है

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    उसी के दम पे तो ये दोस्ती बची हुई थी
    हमारे बीच में जो हम-सरी बची हुई थी

    हमारे बीच में इक पुख़्तगी बची हुई थी
    बची हुई थी मगर आरज़ी बची हुई थी

    उसी के नूर से ये रौशनी बची हुई थी
    मिरे नसीब में जो तीरगी बची हुई थी

    उसी के दम पे मनाया था उस ने जश्न मिरा
    कि दुश्मनी में भी जो दोस्ती बची हुई थी

    कमाल ये था कि हम बहस हार बैठे थे
    हमारे लहजे की शाइस्तगी बची हुई थी

    अगरचे ख़त्म थे रिश्ते पड़ोसियों वाले
    हमारे बीच में हमसायगी बची ही थी

    बदल चुका था वो अपना मिज़ाज मेरे लिए
    मगर दिखावे को इक बे-रुख़ी बची हुई थी

    उसी के नूर से पुर-नूर था ये सारा जहाँ
    हमारी आँख में जो रौशनी बची हुई थी

    अब इस मक़ाम पे पहुँचा दिया था हम ने इश्क़
    जुनून ख़त्म था दीवानगी बची हुई थी

    उसी ने जोड़ के रक्खा हुआ था रिश्ते को
    हमारे बीच में जो बरहमी बची हुई थी

    इस एक बात की शर्मिंदगी ने मार दिया
    मिरे वजूद तिरी तिश्नगी बची हुई थी

    उबूर कर लिया सहरा तो फिर से लौट आए
    जुनून बाक़ी था आशुफ़्तगी बची हुई थी

    मैं गाहे-गाहे उसे याद कर ही लेता था
    इसी बहाने मिरी ज़िंदगी बची हुई थी

    उसी के दम पे पढ़े भी गए सुने भी गए
    हमारे लहजे में जो चाशनी बची हुई थी

    ज़माने तेरी हुनर-कोश रज़्म के हाथों
    मैं लुट चुका था मगर शाएरी बची हुई थी

    वो कौन राज़ था जिस को बयान कर न सके
    वो कौन बात थी जो 'जाफ़री' बची हुई थी

    Liaqat Jafri
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    सर पे सजने को जो तय्यार है मेरे अंदर
    गर्द-आलूद सी दस्तार है मेरे अंदर

    जिस के मर जाने का एहसास बना रहता है
    मुझ से बढ़ कर कोई बीमार है मेरे अंदर

    रोज़ अश्कों की नई फ़स्ल उगा देता है
    एक बूढ़ा सा ज़मींदार है मेरे अंदर

    कितना घनघोर अँधेरा है मिरी रग रग में
    इस क़दर रौशनी दरकार है मेरे अंदर

    दब के मर जाऊँगा इक रोज़ मैं अपने नीचे
    एक गिरती हुई दीवार है मेरे अंदर

    कौन देता है ये हर वक़्त गवाही मेरी
    कौन ये मेरा तरफ़-दार है मेरे अंदर

    मेरे लिक्खे हुए हर लफ़्ज़ को झुटलाता है
    मुझ से बढ़ कर कोई फ़नकार है मेरे अंदर

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    मुस्लिम हूँ पर ख़ुद पे क़ाबू रहता है
    मेरे अंदर भी इक हिन्दू रहता है

    कोई जादूगर के बाज़ू काट भी दे
    उस के हाथ में फिर भी जादू रहता है

    रात गए तक बच्चे दौड़ते रहते हैं
    मेरे कमरे में इक जुगनू रहता है

    'मीर' का दिवाना 'ग़ालिब' का शैदाई
    मेरी बस्ती में इक साधू रहता है

    उस के लबों पर इंग्लिश विंग्लिश रहती है
    मेरे होंट पे उर्दू उर्दू रहता है

    अक़्ल हज़ारों भेस बदलती रहती है
    ये दिल मर जाने तक बुद्धू रहता है

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    अजीब लोग थे वो तितलियाँ बनाते थे
    समुंदरों के लिए सीपियाँ बनाते थे

    वही बनाते थे लोहे को तोड़ कर ताला
    फिर उस के बा'द वही चाबियाँ बनाते थे

    मेरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था
    मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे

    फ़ुज़ूल वक़्त में वो सारे शीशागर मिल कर
    सुहागनों के लिए चूड़ियाँ बनाते थे

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    मैं कुछ दिन से अचानक फिर अकेला पड़ गया हूँ
    नए मौसम में इक वहशत पुरानी काटती है

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    मैं बहुत जल्द लौट आऊँगा
    तुम मिरा इंतिज़ार मत करना

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    इश्क़ तू ने बड़ा नुक़सान किया है मेरा
    मैं तो उस शख़्स से नफ़रत भी नहीं कर सकता

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    मैं दौड़ दौड़ के ख़ुद को पकड़ के लाता हूँ
    तुम्हारे इश्क़ ने बच्चा बना दिया है मुझे

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    कितना दुश्वार है जज़्बों की तिजारत करना
    एक ही शख़्स से दो बार मोहब्बत करना

    जिस को तुम चाहो कोई और न चाहे उस को
    इस को कहते हैं मोहब्बत में सियासत करना

    सुरमई आँख हसीं जिस्म गुलाबी चेहरा
    इस को कहते हैं किताबत पे किताबत करना

    दिल की तख़्ती पे भी आयात लिखी रहती हैं
    वक़्त मिल जाए तो उन की भी तिलावत करना

    देख लेना बड़ी तस्कीन मिलेगी तुम को
    ख़ुद से इक रोज़ कभी अपनी शिकायत करना

    जिस में कुछ क़ब्रें हों कुछ चेहरे हों कुछ यादें हों
    कितना दुश्वार है उस शहर से हिजरत करना

    Liaqat Jafri
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