Muneer Niyazi

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    मुद्दत के बाद आज उसे देखकर 'मुनीर'
    इक बार दिल तो धड़का मगर फिर सँभल गया

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    ये कैसा नश्शा है मैं किस अजब ख़ुमार में हूँ
    तू आ के जा भी चुका है मैं इंतिज़ार में हूँ

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    "हमेशा देर कर देता हूँ"


    हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में
    ज़रूरी बात कहनी हो कोई वा'दा निभाना हो
    उसे आवाज़ देनी हो उसे वापस बुलाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं

    मदद करनी हो उस की यार की ढारस बँधाना हो
    बहुत देरीना रस्तों पर किसी से मिलने जाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं

    बदलते मौसमों की सैर में दिल को लगाना हो
    किसी को याद रखना हो किसी को भूल जाना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं

    किसी को मौत से पहले किसी ग़म से बचाना हो
    हक़ीक़त और थी कुछ उस को जा के ये बताना हो
    हमेशा देर कर देता हूँ मैं हर काम करने में

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    आवाज़ दे के देख लो शायद वो मिल ही जाए
    वर्ना ये उम्र भर का सफ़र राएगाँ तो है

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    आदत सी बना ली है तुमने तो 'मुनीर' अपनी
    जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना

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    इक और दरिया का सामना था 'मुनीर' मुझ को
    मैं एक दरिया के पार उतरा तो मैंने देखा

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    ख़याल जिस का था मुझे ख़याल में मिला मुझे
    सवाल का जवाब भी सवाल में मिला मुझे

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    हँसी छुपा भी गया और नज़र मिला भी गया
    ये इक झलक का तमाशा जिगर जला भी गया

    उठा तो जा भी चुका था अजीब मेहमाँ था
    सदाएँ दे के मुझे नींद से जगा भी गया

    ग़ज़ब हुआ जो अँधेरे में जल उठी बिजली
    बदन किसी का तिलिस्मात कुछ दिखा भी गया

    न आया कोई लब-ए-बाम शाम ढलने लगी
    वुफ़ूर-ए-शौक़ से आँखों में ख़ून आ भी गया

    हवा थी गहरी घटा थी हिना की ख़ुशबू थी
    ये एक रात का क़िस्सा लहू रुला भी गया

    चलो 'मुनीर' चलें अब यहाँ रहें भी तो क्या
    वो संग-दिल तो यहाँ से कहीं चला भी गया

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    ज़िंदा रहें तो क्या है जो मर जाएँ हम तो क्या
    दुनिया से ख़ामुशी से गुज़र जाएँ हम तो क्या

    हस्ती ही अपनी क्या है ज़माने के सामने
    इक ख़्वाब हैं जहाँ में बिखर जाएँ हम तो क्या

    अब कौन मुंतज़िर है हमारे लिए वहाँ
    शाम आ गई है लौट के घर जाएँ हम तो क्या

    दिल की ख़लिश तो साथ रहेगी तमाम उम्र
    दरिया-ए-ग़म के पार उतर जाएँ हम तो क्या

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    किसी को अपने अमल का हिसाब क्या देते
    सवाल सारे ग़लत थे जवाब क्या देते

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