Shahryar

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    दिल चीज़ क्या है आप मिरी जान लीजिए
    बस एक बार मेरा कहा मान लीजिए

    इस अंजुमन में आप को आना है बार बार
    दीवार-ओ-दर को ग़ौर से पहचान लीजिए

    माना कि दोस्तों को नहीं दोस्ती का पास
    लेकिन ये क्या कि ग़ैर का एहसान लीजिए

    कहिए तो आसमाँ को ज़मीं पर उतार लाएँ
    मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

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    सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
    यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का

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    गुलाब टहनी से टूटा ज़मीन पर न गिरा
    करिश्मे तेज़ हवा के समझ से बाहर हैं

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    है आज ये गिला कि अकेला है 'शहरयार'
    तरसोगे कल हुजूम में तन्हाई के लिए

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    सभी को ग़म है समुंदर के ख़ुश्क होने का
    कि खेल ख़त्म हुआ कश्तियाँ डुबोने का

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    दिल है तो धड़कने का बहाना कोई ढूँढे
    पत्थर की तरह बेहिस ओ बेजान सा क्यूँ है

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    या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है
    या अपनी मोहब्बत पे भरोसा नहीं हम को

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    तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा
    आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा

    देखने के लिए इक चेहरा बहुत होता है
    आँख जब तक है तुझे सिर्फ़ तुझे देखूँगा

    मेरी तन्हाई की रुस्वाई की मंज़िल आई
    वस्ल के लम्हे से मैं हिज्र की शब बदलूँगा

    शाम होते ही खुली सड़कों की याद आती है
    सोचता रोज़ हूँ मैं घर से नहीं निकलूँगा

    ता-कि महफ़ूज़ रहे मेरे क़लम की हुरमत
    सच मुझे लिखना है मैं हुस्न को सच लिक्खूंगा

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    हम खुश हैं हमे धूप विरासत में मिली है
    अजदाद कहीं पेड़ भी कुछ बो गए होते

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    शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को
    मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को

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