Munawwar Rana

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    कभी ख़ुशी से ख़ुशी की तरफ़ नहीं देखा
    तुम्हारे बा'द किसी की तरफ़ नहीं देखा

    ये सोच कर कि तिरा इंतिज़ार लाज़िम है
    तमाम-उम्र घड़ी की तरफ़ नहीं देखा

    यहाँ तो जो भी है आब-ए-रवाँ का आशिक़ है
    किसी ने ख़ुश्क नदी की तरफ़ नहीं देखा

    वो जिस के वास्ते परदेस जा रहा हूँ मैं
    बिछड़ते वक़्त उसी की तरफ़ नहीं देखा

    न रोक ले हमें रोता हुआ कोई चेहरा
    चले तो मुड़ के गली की तरफ़ नहीं देखा

    बिछड़ते वक़्त बहुत मुतमइन थे हम दोनों
    किसी ने मुड़ के किसी की तरफ़ नहीं देखा

    रविश बुज़ुर्गों की शामिल है मेरी घुट्टी में
    ज़रूरतन भी सखी की तरफ़ नहीं देखा

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    किसी को घर मिला हिस्से में या कोई दुकाँ आई
    मैं घर में सब से छोटा था मिरे हिस्से में माँ आई

    यहाँ से जाने वाला लौट कर कोई नहीं आया
    मैं रोता रह गया लेकिन न वापस जा के माँ आई

    अधूरे रास्ते से लौटना अच्छा नहीं होता
    बुलाने के लिए दुनिया भी आई तो कहाँ आई

    किसी को गाँव से परदेस ले जाएगी फिर शायद
    उड़ाती रेल-गाड़ी ढेर सारा फिर धुआँ आई

    मिरे बच्चों में सारी आदतें मौजूद हैं मेरी
    तो फिर इन बद-नसीबों को न क्यूँ उर्दू ज़बाँ आई

    क़फ़स में मौसमों का कोई अंदाज़ा नहीं होता
    ख़ुदा जाने बहार आई चमन में या ख़िज़ाँ आई

    घरौंदे तो घरौंदे हैं चटानें टूट जाती हैं
    उड़ाने के लिए आँधी अगर नाम-ओ-निशाँ आई

    कभी ऐ ख़ुश-नसीबी मेरे घर का रुख़ भी कर लेती
    इधर पहुँची उधर पहुँची यहाँ आई वहाँ आई

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    किसी के ज़ख़्म पर चाहत से पट्टी कौन बाँधेगा
    अगर बहनें नहीं होंगी तो राखी कौन बाँधेगा

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    चलती फिरती हुई आँखों से अज़ाँ देखी है
    मैं ने जन्नत तो नहीं देखी है माँ देखी है

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    अभी ज़िंदा है माँ मेरी मुझे कुछ भी नहीं होगा
    मैं घर से जब निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है

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    जहाँ से जी न लगे तुम वहीं बिछड़ जाना
    मगर ख़ुदा के लिए बेवफ़ाई न करना

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    ख़ुदा ने यह सिफ़त दुनिया की हर औरत को बख़्शी है
    कि वो पागल भी हो जाए तो बेटे याद रहते हैं

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    दिल ऐसा कि सीधे किये जूते भी बड़ों के
    ज़िद इतनी कि ख़ुद ताज उठा कर नहीं पहना

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    तुम्हारी आँखों की तौहीन है ज़रा सोचो
    तुम्हारा चाहने वाला शराब पीता है

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    अब दोस्त कोई लाओ मुकाबिल में हमारे
    दुश्मन तो कोई क़द के बराबर नहीं निकला

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