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उस पेड़ को छुआ तो समर-दार हो गया
फिर जाने क्या हुआ वो शरर-बार हो गया
फिर जाने क्या हुआ वो शरर-बार हो गया
मौसम की भूल थी कि मिरी दस्तरस की बात
पत्थर से एक फूल नुमूदार हो गया
बिखरे हुए हैं दिल में मिरी ख़्वाहिशों के रंग
अब मैं भी इक सजा हुआ बाज़ार हो गया
इक बार मैं भी ख़्वाब में बैठा था तख़्त पर
आँखें खुलीं तो और भी नादार हो गया
पहले तो सर को फोड़ लिया उस को देख कर
फिर मैं भी एक रौज़न-ए-दीवार हो गया
वैसे तमाम उम्र मिरी नींद में कटी
घर में नक़ब लगी तो मैं बेदार हो गया
यारो ये ज़िंदगी का मकाँ भी अजीब है
ता'मीर हो गया कभी मिस्मार हो गया
लफ़्ज़ों के फूल आँच सी देने लगे मुझे
बेबाक आज शो'ला-ए-गुफ़्तार हो गया
दुश्मन नज़र पड़ा तो मिटीं रंजिशें तमाम
लड़ने को सारा शहर ही तय्यार हो गया
मुजरिम बरी हुआ तो कई क़त्ल हो गए
बस्ती का इक ग़रीब गिरफ़्तार हो गया
'अफ़ज़ल' कुछ इस तरह की अचानक हवा चली
साँसें बहाल रखना भी दुश्वार हो गया
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मैं अपने दिल में नई ख़्वाहिशें सजाए हुए
खड़ा हुआ हूँ हवा में क़दम जमाए हुए
खड़ा हुआ हूँ हवा में क़दम जमाए हुए
नए जहाँ की तमन्ना में घर से निकला हूँ
हथेलियों पे नई मिशअलें जलाए हुए
हवा के फूल महकने लगे मुझे पा कर
मैं पहली बार हँसा ज़ख़्म को छुपाए हुए
न आँधियाँ हैं न तूफ़ाँ न ख़ून के सैलाब
हैं ख़ुशबुओं में मनाज़िर सभी नहाए हुए
पिघल गई हैं अचानक ग़मों की ज़ंजीरें
गिरे हैं धूप के नेज़े बदन चुराए हुए
दिखा रही है नई ज़िंदगी के नक़्श-ए-क़दम
सुकूँ की नींद गले से मुझे लगाए हुए
चटख़ने वाली ज़मीं दूर रह गई 'अफ़ज़ल'
हैं सारे खेत सितारों के लहलहाए हुए
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काँच की ज़ंजीर टूटी तो सदा भी आएगी
और भरे बाज़ार में तुझ को हया भी आएगी
और भरे बाज़ार में तुझ को हया भी आएगी
इत्र में कपड़े बसा कर मुतमइन है किस लिए
बा-वफ़ा हूँ जा कि यूँ बू-ए-वफ़ा भी आएगी
देख ले साहिल से जी भर के मचलती लहर को
इस तरफ़ कुछ देर में मौज-ए-फ़ना भी आएगी
दूधिया नाज़ुक गले में बाँध ले ता'वीज़ को
आज सुनता हूँ कि बस्ती में बला भी आएगी
रात के पिछले पहर दस्तक का रख लेना ख़याल
पत्ते खड़केंगे ज़रा आवाज़-ए-पा भी आएगी
उजली उजली ख़्वाहिशों पर नींद की चादर न डाल
याद के रौज़न से कुछ ताज़ा हवा भी आएगी
जा चुके सारे बगूले फ़िक्र की क्या बात है
खेत को सैराब करने अब घटा भी आएगी
दौर के लोगों को नज़रों में बसा कर देख ले
क़ुर्ब मिल जाएगा आँखों में जिला भी आएगी
शहर-ए-ना-पुरसाँ के मंज़र नक़्श कर ले ज़ेहन में
आँख रस्ते में कोई मंज़र गिरा भी आएगी
दिल की मस्जिद में कभी पढ़ ले तहज्जुद की नमाज़
फिर सहर के वक़्त होंटों पर दुआ भी आएगी
ज़िंदगी का ये मरज़ 'अफ़ज़ल' चला ही जाएगा
तेरे हाथों में कभी ख़ाक-ए-शिफ़ा भी आएगी
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