इतनी मुश्किल में कभी पहले तो जाँ आई न थी
ऐ मोहब्बत जब मिरी तुझ से शनासाई न थी
ऐ मोहब्बत जब मिरी तुझ से शनासाई न थी
ज़िंदगी में सैंकड़ों ग़म थे तिरे ग़म के सिवा
दिल में वीराने तो थे पर इतनी तन्हाई न थी
रहगुज़र थी हादसे थे फ़ासला था धूप थी
बरहना-पाई थी लेकिन आबला-पाई न थी
बच के तूफ़ाँ से किसी सूरत निकल आए मगर
हम वहाँ डूबे जहाँ दरिया में गहराई न थी
ऐ मसीहा देखने निकला था मैं तेरा निज़ाम
हर तरफ़ तू था मगर तेरी मसीहाई न थी
अपने ज़ख़्मों की नुमाइश बे-हिसों के शहर में
इस दिल-ए-मुज़्तर की नादानी थी दानाई न थी
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यूँ नहीं था कि तीरगी कम थी
धूप से अपनी दोस्ती कम थी
धूप से अपनी दोस्ती कम थी
ख़्वाहिशों के हुजूम थे लेकिन
अपने हिस्से में ज़िंदगी कम थी
तुम न आए तो बस हुआ इतना
कल चराग़ों में रौशनी कम थी
हाँ वो हँस कर नहीं मिला फिर भी
उस की बातों में बे-रुख़ी कम थी
ग़म उसे भी न था बिछड़ने का
मेरी आँखों में भी नमी कम थी
कुछ तग़ाफ़ुल-मिज़ाज था साक़ी
और कुछ अपनी प्यास भी कम थी
उस का लहजा तो ख़ूब था लेकिन
उस के शे'रों में शाइ'री कम थी
क्यूँ मुझे दे गया वो सन्नाटे
क्या मिरे घर में ख़ामुशी कम थी
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अब किसी को क्या बताएँ किस क़दर नादान थे
हम वहीं कश्ती को ले आए जहाँ तूफ़ान थे
हम वहीं कश्ती को ले आए जहाँ तूफ़ान थे
कुछ तड़पती आरज़ूएँ चंद बे-मा'नी सवाल
कारवाँ में सब के सर पर बस यही सामान थे
हम ने इस दुनिया के मय-ख़ाने में ये देखा फ़रेब
बस वही प्यासे रहे जो साहिब-ए-ईमान थे
ज़लज़लों पर आ गया इल्ज़ाम अच्छा ही हुआ
वर्ना इस तख़रीब के पहले से भी इम्कान थे
उन ग़मों ने दिल में सदियों के वसीले कर लिए
जो फ़क़त दो-चार दिन के वास्ते मेहमान थे
बस यही सच है कि हम अब उन की महकूमी में हैं
जो 'नफ़स' अपनी हवेली में कभी दरबान थे
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हम आज अपना मुक़द्दर बदल के देखते हैं
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर चल के देखते हैं
तुम्हारे साथ भी कुछ दूर चल के देखते हैं
उधर चराग़ बुझाने को है हवा बेताब
इधर ये ज़िद कि हवाओं में जल के देखते हैं
चलो फिर आज ज़मीनों में जज़्ब हो जाएँ
छलक के आँख से बाहर निकल के देखते हैं
ये इश्क़ कोई बला है जुनून है क्या है
ये कैसी आग है पत्थर पिघल के देखते हैं
अजीब प्यास है दरिया से बुझ नहीं पाई
जो तुम कहो तो समुंदर निगल के देखते हैं
वो गर निगाह मिला ले तो मो'जिज़ा कर दे
इसी लिए तो उधर हम सँभल के देखते हैं
बदल के ख़ुद ही हमीं रह गए ज़माने में
चले थे घर से कि दुनिया बदल के देखते हैं
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वो मेरा दोस्त है और मुझ से वास्ता भी नहीं
जो क़ुर्बतें भी नहीं हैं तो फ़ासला भी नहीं
जो क़ुर्बतें भी नहीं हैं तो फ़ासला भी नहीं
किसे ख़बर थी कि उस दश्त से गुज़रना है
जहाँ से लौट के आने का रास्ता भी नहीं
कभी जो फूट के रो ले तो चैन पा जाए
मगर ये दिल मिरे पैरों का आबला भी नहीं
सुना है वो भी मिरे क़त्ल में मुलव्विस है
वो बे-वफ़ा है मगर इतना बे-वफ़ा भी नहीं
वो सो सका न जिसे छीन कर कभी मुझ से
मैं उस ज़मीन के बारे में सोचता भी नहीं
सुना था शहर में हर सू तुम्हारा चर्चा है
यहाँ तो कोई 'नफ़स' तुम को जानता भी नहीं
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