यूँँ तो ख़ुद अपने ही साए से भी डर जाते हैं लोग

हादसे कैसे भी हों लेकिन गुज़र जाते हैं लोग

जब मुझे दुश्वारियों से रू-ब-रू होना पड़ा
तब मैं समझा रेज़ा रेज़ा क्यूँ बिखर जाते हैं लोग

सिर्फ़ ग़ाज़ा ही नहीं चेहरों की रा'नाई का राज़
शिद्दत-ए-ग़म की तपिश से भी निखर जाते हैं लोग

मसअले आ कर लिपट जाते हैं बच्चों की तरह
शाम को जब लौट कर दफ़्तर से घर जाते हैं लोग

हर 'नफ़स' मर मर के जीते हैं तुझे ऐ ज़िंदगी
और जीने की तमन्ना में ही मर जाते हैं लोग

— Nafas Ambalvi

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