मुझे अपनी पस्ती की शर्म है तिरी रिफ़अ'तों का ख़याल है
मगर अपने दिल को मैं क्या करूँ उसे फिर भी शौक़-ए-विसाल है
इस अदा से कौन ये जल्वा-गर सर-ए-बज़्म-ए-हुस्न-ए-ख़्याल है
जो नफ़स है मस्त-ए-बहार है जो नज़र है ग़र्क़-ए-जमाल है
उन्हें ज़िद है अर्ज़-ए-विसाल से मुझे शौक़-ए-अर्ज़-ए-विसाल है
वही अब भी उन का जवाब है वही अब भी मेरा सवाल है
तिरी याद में हुआ जब से गुम तिरे गुम-शुदा का ये हाल है
कि न दूर है न क़रीब है न फ़िराक़ है न विसाल है
तिरी बज़्म-ए-ख़लवत-ए-ला-मकाँ तिरा आस्ताँ मह-ओ-कहकशाँ
मगर ऐ सितारा-ए-आरज़ू मुझे आरज़ू-ए-विसाल है
मैं वतन में रह के भी बे-वतन कि नहीं है एक भी हम-सुख़न
है कोई शरीक-ए-ग़म-ओ-मेहन तो वो इक नसीम-ए-शुमाल है
मैं बताऊँ वाइज़-ए-ख़ुश-नवा है जहान-ओ-ख़ुल्द में फ़र्क़ क्या
ये अगर फ़रेब-ए-ख़याल है वो फ़रेब-ए-हुस्न-ए-ख़याल है
यही दाद-ए-क़िस्सा-ए-ग़म मिली कि नज़र उठी न ज़बाँ मिली
फ़क़त इक तबस्सुम-ए-शर्मगीं मिरी बे-कसी का मआल है
वो ख़ुशी नहीं है वो दिल नहीं मगर उन का साया सा हम-नशीं
फ़क़त एक ग़म-ज़दा याद है फ़क़त इक फ़सुर्दा ख़याल है
कहीं किस से 'अख़्तर'-ए-बे-नवा हमें बज़्म-ए-दहर से क्या मिला
वही एक साग़र-ए-ज़हर-ए-ग़म जो हरीफ़-ए-नोश-ए-कमाल है
वो कभी मिल जाएँ तो क्या कीजिए
रात दिन सूरत को देखा कीजिए
चाँदनी रातों में इक इक फूल को
बे-ख़ुदी कहती है सज्दा कीजिए
जो तमन्ना बर न आए उम्र भर
उम्र भर उस की तमन्ना कीजिए
इश्क़ की रंगीनियों में डूब कर
चाँदनी रातों में रोया कीजिए
पूछ बैठे हैं हमारा हाल वो
बे-ख़ुदी तू ही बता क्या कीजिए
हम ही उस के इश्क़ के क़ाबिल न थे
क्यूँ किसी ज़ालिम का शिकवा कीजिए
आप ही ने दर्द-ए-दिल बख़्शा हमें
आप ही इस का मुदावा कीजिए
कहते हैं 'अख़्तर' वो सुन कर मेरे शेर
इस तरह हम को न रुस्वा कीजिए
दिन रात मय-कदे में गुज़रती थी ज़िंदगी
'अख़्तर' वो बे-ख़ुदी के ज़माने किधर गए
काँटों से दिल लगाओ जो ता-उम्र साथ दें
फूलों का क्या जो साँस की गर्मी न सह सकें