क्या लोग हैं कि दिल की गिरह खोलते नहीं
आँखों से देखते हैं मगर बोलते नहीं
आँखों से देखते हैं मगर बोलते नहीं
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ख़्वाब-महल में कौन सर-ए-शाम आ कर पत्थर मारता है
रोज़ इक ताज़ा काँच का बर्तन हाथ से गिर कर टूटता है
रोज़ इक ताज़ा काँच का बर्तन हाथ से गिर कर टूटता है
मकड़ी ने दरवाज़े पे जाले दूर तलक बुन रक्खे हैं
फिर भी कोई गुज़रे दिनों की ओट से अंदर झाँकता है
शोर सा उठता रहता है दीवारें बोलती रहती हैं
शाम अभी तक आ नहीं पाती कोई खिलौने तोड़ता है
अव्वल-ए-शब की लोरी भी कब काम किसी के आती है
दिल वो बचा अपनी सदा पर कच्ची नींद से जागता है
अंदर बाहर की आवाज़ें इक नुक़्ते पर सिमटी हैं
होता है गलियों में वावेला मेरा लहू जब बोलता है
मेरी साँसों की लर्ज़िश मंज़र का हिस्सा बनती है
देखता हूँ मैं खिड़की से जब शाख़ पे पत्ता काँपता है
मेरे सिरहाने कोई बैठा ढारस देता रहता है
नब्ज़ पे हाथ भी रखता है टूटे धागे भी जोड़ता है
बादल उठे या कि न उठे बारिश भी हो या कि न हो
मैं जब भीगने लगता हूँ वो सर पर छतरी तानता है
वक़्त गुज़रने के हम-राह बहुत कुछ सीखा 'अख़्तर' ने
नंगे बदन को किरनों के पैराहन से अब ढाँपता है
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न जब कोई शरीक-ए-ज़ात होगा
मिरा हम-ज़ाद मेरे साथ होगा
मिरा हम-ज़ाद मेरे साथ होगा
घरों के बंद दरवाज़ों में रौशन
वही इक ज़ख़्म-ए-एहसासात होगा
न यूँ दहलीज़ तक आओ कि बाहर
गली में फ़ितना-ए-ज़र्रात होगा
कुरेदे जाओ यूँ ही राख दिल की
कहीं तो शो'ला-ए-जज़्बात होगा
दरीचे यूँ तो खुल सकते नहीं थे
हवाओं में किसी का हात होगा
किताबों में मिलेंगे शे'र मेरे
मिरा ग़म रौनक़-ए-सफ़्हात होगा
यही दिन में ढलेगी रात 'अख़्तर'
यही दिन का उजाला रात होगा
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