Behzad Lakhnavi

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    कहाँ हो तुम चले आओ मोहब्बत का तक़ाज़ा है
    ग़म-ए-दुनिया से घबरा कर तुम्हें दिल ने पुकारा है

    तुम्हारी बे-रुख़ी इक दिन हमारी जान ले लेगी
    क़सम तुम को ज़रा सोचो कि दस्तूर-ए-वफ़ा क्या है

    न जाने किस लिए दुनिया की नज़रें फिर गईं हम से
    तुम्हें देखा तुम्हें चाहा क़ुसूर इस के सिवा क्या है

    न है फ़रियाद होंटों पर न आँखों में कोई आँसू
    ज़माने से मिला जो ग़म उसे गीतों में गाया है
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    तुझ पर मिरी मोहब्बत क़ुर्बान हो न जाए
    ये कुफ़्र बढ़ते बढ़ते ईमान हो न जाए

    अल्लाह री बे-नक़ाबी उस जान-ए-मुद्दआ की
    मेरी निगाह-ए-हसरत हैरान हो न जाए

    मेरी तरफ़ न देखो अपनी नज़र को रोको
    दुनिया-ए-आशिक़ी में हैजान हो न जाए

    पलकों पे रुक गया है आ कर जो एक आँसू
    ये क़तरा बढ़ते बढ़ते तूफ़ान हो न जाए

    हद्द-ए-सितम तो है भी हद्द-ए-वफ़ा नहीं है
    ज़ालिम तिरा सितम भी एहसान हो न जाए

    होती नहीं है वक़अत होती नहीं है इज़्ज़त
    जब तक कि कोई इंसाँ इंसान हो न जाए

    उस वक़्त तक मुकम्मल होता नहीं है कोई
    जब तक कि ख़ुद को अपनी पहचान हो न जाए

    'बहज़ाद' इस लिए मैं कहता नहीं हूँ दिल की
    डरता हूँ सुन के दुनिया हैरान हो न जाए
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    क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ
    तू जान-ए-तमाशा है मैं महव-ए-तमाशा हूँ

    तू बाइस-ए-हस्ती है मैं हासिल-ए-हस्ती हूँ
    तू ख़ालिक़-उल्फ़त है और मैं तिरा बंदा हूँ

    जब तक न मिला था तू ऐ फ़ित्ना-ए-दो-आलम
    जब दर्द से ग़ाफ़िल था अब दर्द की दुनिया हूँ

    कुछ फ़र्क़ नहीं तुझ में और मुझ में कोई लेकिन
    तू और किसी का है बे-दर्द मैं तेरा हूँ

    मुद्दत हुई खो बैठा सरमाया-ए-तस्कीं मैं
    अब तो तिरी फ़ुर्क़त में दिन रात तड़पता हूँ

    अरमान नहीं कोई गो दिल में मिरे लेकिन
    अल्लाह री मजबूरी मजबूर-ए-तमन्ना हूँ

    'बहज़ाद'-ए-हज़ीं मुझ पर इक कैफ़ सा तारी है
    अब ये मिरा आलम है हँसता हूँ न रोता हूँ
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    ऐ जज़्बा-ए-दिल गर मैं चाहूँ हर चीज़ मुक़ाबिल आ जाए
    मंज़िल के लिए दो गाम चलूँ और सामने मंज़िल आ जाए

    दिल की लगी चल यूँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में
    उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए

    ऐ रहबर-ए-कामिल चलने को तय्यार तो हूँ पर याद रहे
    उस वक़्त मुझे भटका देना जब सामने मंज़िल आ जाए

    हाँ याद मुझे तुम कर लेना आवाज़ मुझे तुम दे लेना
    इस राह-ए-मोहब्बत में कोई दरपेश जो मुश्किल आ जाए

    अब क्यूँ ढूँडूँ वो चश्म-ए-करम होने दे सितम बाला-ए-सितम
    मैं चाहता हूँ ऐ जज़्बा-ए-ग़म मुश्किल पस-ए-मुश्किल आ जाए

    इस जज़्बा-ए-दिल के बारे में इक मशवरा तुम से लेता हूँ
    उस वक़्त मुझे क्या लाज़िम है जब तुझ पे मिरा दिल आ जाए

    ऐ बर्क़-ए-तजल्ली कौंध ज़रा क्या मुझ को भी मूसा समझा है
    मैं तूर नहीं जो जल जाऊँ जो चाहे मुक़ाबिल आ जाए

    कश्ती को ख़ुदा पर छोड़ भी दे कश्ती का ख़ुदा ख़ुद हाफ़िज़ है
    मुश्किल तो नहीं इन मौजों में बहता हुआ साहिल आ जाए
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    दिल की ख़लिश चल यूँही सही चलता तो हूँ उन की महफ़िल में
    उस वक़्त मुझे चौंका देना जब रंग पे महफ़िल आ जाए
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    मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं
    तेरे बग़ैर ज़ीस्त तो है ज़िंदगी नहीं

    मैं दर्द-ए-आशिक़ी को समझता हूँ जान-ओ-रूह
    कम्बख़्त वो भी दिल में कभी है कभी नहीं

    ला ग़म ही डाल दे मिरे दस्त-ए-सवाल में
    मैं क्या करूँं ख़ुशी को जो तेरी ख़ुशी नहीं

    कुछ देर और रहने दे ख़ुद्दारी-ए-जुनूँ
    दामन तो चाक होना है लेकिन अभी नहीं

    साक़ी निगाह-ए-नाज़ से लिल्लाह काम ले
    सौ जाम पी चुका हूँ मगर बे-ख़ुदी नहीं

    रखनी पड़ेगी तुम को तही-दामनी की लाज
    मुझ को कमी ज़रूर है तुम को कमी नहीं

    'बहज़ाद' साफ़ साफ़ मैं कहता हूँ हाल-ए-दिल
    शर्मिंदा-ए-कमाल मिरी शा'इरी नहीं
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