दुनिया का चलन तर्क किया भी नहीं जाता
इस जादा-ए-बातिल से फिरा भी नहीं जाता
इस जादा-ए-बातिल से फिरा भी नहीं जाता
ज़िंदान-ए-मुसीबत से कोई निकले तो क्यूँकर
रुस्वा सर-ए-बाज़ार हुआ भी नहीं जाता
दिल बाद-ए-फ़ना भी है गिराँ-बार-ए-अमानत
दुनिया से सुबुक-दोश उठा भी नहीं जाता
क्यूँ आने लगे शाहिद-ए-इस्मत सर-ए-बाज़ार
क्या ख़ाक के पर्दे में छुपा भी नहीं जाता
इक मअ'नी-ए-बे-लफ़्ज़ है अंदेशा-ए-फ़र्दा
जैसे ख़त-ए-क़िस्मत कि पढ़ा भी नहीं जाता
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पिछले को उठ खड़ा न हो दर्द-ए-जिगर कहीं
पहुँचे न उड़ते उड़ते कहीं से ख़बर कहीं
पहुँचे न उड़ते उड़ते कहीं से ख़बर कहीं
कैफ़िय्यत-ए-हयात से ख़ाली हुआ है दिल
ओ साक़ी-ए-अज़ल मिरा पैमाना भर कहीं
मर जाएँगे तड़प के असीरान-ए-बद-नसीब
सुन पाएँगे जो मुज़्दा-ए-वहशत-ए-असर कहीं
फड़का किए मुरक़्क़ा-ए-आलम के हुस्न पर
ठहरी कभी न अहल-ए-हवस की नज़र कहीं
आख़िर हिजाब-ओ-शर्म की हद भी है मेहरबाँ
पर्दा उलट न दे मिरी आह-ए-सहर कहीं
दिन वादा-ए-विसाल का नज़दीक आ चुका
फिर देर क्या है 'यास' अरे कम्बख़्त मर कहीं
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मज़ा गुनाह का जब था कि बा-वज़ू करते
बुतों को सज्दा भी करते तो क़िबला-रू करते
बुतों को सज्दा भी करते तो क़िबला-रू करते
कभी न परवरिश-ए-नख़्ल-ए-आरज़ू करते
नुमू से पहले जो अंदेशा-ए-नुमू करते
सुनें न दिल से तो फिर क्या पड़ी थी ख़ारों को
कि गुल को महरम-ए-अंजाम-ए-रंग-ओ-बू करते
गुनाह था भी तो कैसा गुनाह-बे-लज़्ज़त
क़फ़स में बैठ के क्या याद-ए-रंग-ओ-बू करते
बहाना चाहती थी मौत बस न था अपना
कि मेज़बानी-ए-मेहमान-ए-हीला-ए-जु करते
दलील-ए-राह दिल-ए-शब चराग़ था तन्हा
बुलंद-ओ-पस्त में गुज़री है जुस्तुजू करते
अज़ल से जो कशिश-ए-मरकज़ी के थे पाबंद
हवा की तरह वो क्या सैर चार-सू करते
फ़लक ने भूल-भुलय्यों में डाल रक्खा था
हम उन को ढूँडते या अपनी जुस्तुजू करते
असीर-ए-हाल न मुर्दों में हैं न ज़िंदों में
ज़बान कटती है आपस में गुफ़्तुगू करते
पनाह मिलती न उम्मीद-ए-बे-वफ़ा को कहीं
हवस-नसीब अगर तर्क-ए-आरज़ू करते
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कारगाह-ए-दुनिया की नेस्ती भी हस्ती है
इक तरफ़ उजड़ती है एक सम्त बसती है
इक तरफ़ उजड़ती है एक सम्त बसती है
बे-दिलों की हस्ती क्या जीते हैं न मरते हैं
ख़्वाब है न बेदारी होश है न मस्ती है
क्या बताऊँ क्या हूँ मैं क़ुदरत-ए-ख़ुदा हूँ मैं
मेरी ख़ुद-परस्ती भी ऐन हक़-परस्ती है
कीमिया-ए-दिल क्या है ख़ाक है मगर कैसी
लीजिए तो महँगी है बेचिए तो सस्ती है
ख़िज़्र-ए-मंज़िल अपना हूँ अपनी राह चलता हूँ
मेरे हाल पर दुनिया क्या समझ के हँसती है
क्या कहूँ सफ़र अपना ख़त्म क्यूँ नहीं होता
फ़िक्र की बुलंदी या हौसले की पस्ती है
हुस्न-ए-बे-तमाशा की धूम क्या मुअम्मा है
कान भी हैं ना-महरम आँख भी तरसती है
चितवनों से मिलता है कुछ सुराग़ बातिन का
चाल से तो काफ़िर पर सादगी बरसती है
तर्क-ए-लज़्ज़त-ए-दुनिया कीजिए तो किस दिल से
ज़ौक़-ए-पारसाई क्या फ़ैज़-ए-तंग-दस्ती है
दीदनी है 'यास' अपने रंज ओ ग़म की तुग़्यानी
झूम झूम कर क्या क्या ये घटा बरसती है
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महरूम-ए-शहादत की है कुछ तुझ को ख़बर भी
ओ दुश्मन-ए-जाँ देख ज़रा फिर के इधर भी
ओ दुश्मन-ए-जाँ देख ज़रा फिर के इधर भी
है जान के साथ और इक ईमान का डर भी
वो शोख़ कहीं देख न ले मुड़ के इधर भी
वो हम से नहीं मिलते हम उन से नहीं मिलते
इक नाज़-ए-दिल-आवेज़ इधर भी है उधर भी
ठंडा हो कलेजा मिरा इस आह-ए-सहरस
जब दिल की तरह जलने लगे ग़ैर का घर भी
अल्लाह-री बे-ताबी-ए-दिल वस्ल की शब को
कुछ कश्मकश-ए-शौक़ भी कुछ सुब्ह का डर भी
अंगड़ाइयाँ ले ले के उठे साहिब-ए-महफ़िल
कुछ नींद भी आँखों में है कुछ मय का असर भी
हम माँगते ही क्यूँ जो यही जानते साक़ी
फिर जाएगी क़िस्मत की तरह तेरी नज़र भी
हम हाथ से दिल था
में हुए दूर खड़े हैं
देखें तो कोई लेता है कुछ इस का असर भी
ऐ जज़्बा-ए-दिल देख बहुत तू ने कमी की
हाँ आहों में अब चाहिए थोड़ा सा असर भी
अब चुप रहो जो दिल पे गुज़रनी थी वो गुज़री
ऐसा न हो फट जाए कहीं ज़ख़्म-ए-जिगर भी
महरूम-ए-शहादत तुझे कुछ शर्म न आई
कम-बख़्त गला काट के जल्दी कहीं मर भी
भारी है मुसाफ़िर पे बहुत गोर की मंज़िल
सुनते हैं कि इस राह में है जान का डर भी
वो कशमकश-ए-ग़म है कि मैं कह नहीं सकता
आग़ाज़ का अफ़्सोस और अंजाम का डर भी
खोल आँखें ज़रा मस्त है क्या साग़र जम से
है गर्दिश-ए-अय्याम की कुछ तुझ को ख़बर भी
लैली-ए-शब-ए-हिज्र ने बिखरा दिए गेसू
मातम में मिरे चाक-ए-गरेबाँ है सहर भी
किस शान से आती है मिरी शाम-ए-मुसीबत
वो देखो जिलौ में है क़यामत की सहर भी
बुझती हुई इक शम्अ'' हूँ क्या दम का भरोसा
दुश्मन है मिरी जान की अब आह-ए-सहर भी
देखे कोई जाती हुई दुनिया का तमाशा
बीमार भी सर धुनता है और शम-ए-सहर भी
सहरा की हवा खींचे लिए जाती है मुझ को
कहता है वतन देख ज़रा फिर के इधर भी
हाँ कट गई शायद तिरे दीवाने की बेड़ी
पिछले-पहर आई थी कुछ आवाज़ इधर भी
क्या वा'दा-ए-दीदार को सच जानते हो 'यास'
लो फ़र्ज़ करो आई क़यामत की सहर भी
अल्लाह मुबारक करे पीरी की सहर 'यास'
मरने की तमन्ना थी तो ले अब कहीं मर भी
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सब तिरे सिवा काफ़िर आख़िर इस का मतलब क्या
सर फिरा दे इंसाँ का ऐसा ख़ब्त-ए-मज़हब क्या
सर फिरा दे इंसाँ का ऐसा ख़ब्त-ए-मज़हब क्या
इक इशारा-ए-फ़र्दा एक जुम्बिश-ए-लब क्या
देख दिखाता है वा'दा-ए-तज़ब्ज़ब क्या
चुल्लू-भर में मतवाली दो ही घूँट में ख़ाली
ये भरी जवानी क्या जज़्बा-ए-लबालब क्या
हाँ दुआएँ लेता जा गालियाँ भी देता जा
ताज़गी तो कुछ पहुँचे चाहता रहूँ लब क्या
शामत आ गई आख़िर कह गया ख़ुदा-लगती
रास्ती का फल पाता बंदा-ए-मुक़र्रब क्या
उल्टी-सीधी सुनता रह अपनी कह तो उल्टी कह
सादा है तू क्या जाने भाँपने का है ढब क्या
सब जिहाद हैं दिल के सब फ़साद हैं दिल के
बे-दिलों का मतलब क्या और तर्क-ए-मतलब क्या
हो रहेगा सज्दा भी जब किसी की याद आई
याद जाने कब आए ज़िंदा-दारी-ए-शब क्या
आँधियाँ रुकें क्यूँ कर ज़लज़ले थमीं क्यूँ कर
कार-गाह-ए-फ़ितरत में पासबानी-ए-रब क्या
कार-ए-मर्ग कै दिन का थोड़ी देर का झगड़ा
देखना है ये नादाँ जीने का है कर्तब क्या
पड़ चुके बहुत पाले डस चुके बहुत काले
मूज़ियों के मूज़ी को फ़िक्र-ए-नीश-ए-अक़रब क्या
मीरज़ा 'यगाना' वाह ज़िंदाबाद ज़िंदाबाद
इक बला-ए-बे-दरमाँ क्या थे तुम और अब क्या
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अदब ने दिल के तक़ाज़े उठाए हैं क्या क्या
हवस ने शौक़ के पहलू दबाए हैं क्या क्या
हवस ने शौक़ के पहलू दबाए हैं क्या क्या
न जाने सहव-ए-क़लम है कि शाहकार-ए-क़लम
बला-ए-हुस्न ने फ़ित्ने उठाए हैं क्या क्या
निगाह डाल दी जिस पर वो हो गया अंधा
नज़र ने रंग-ए-तसर्रुफ़ दिखाए हैं क्या क्या
इसी फ़रेब ने मारा कि कल है कितनी दूर
इस आज कल में अबस दिन गँवाए हैं क्या क्या
पहाड़ काटने वाले ज़मीं से हार गए
इसी ज़मीन में दरिया समाए हैं क्या क्या
गुज़र के आप से हम आप तक पहुँच तो गए
मगर ख़बर भी है कुछ फेर खाए हैं क्या क्या
बुलंद हो तो खुले तुझ पे ज़ोर पस्ती का
बड़े-बड़ों के क़दम डगमगाए हैं क्या क्या
ख़ुशी में अपने क़दम चूम लूँ तो ज़ेबा है
वो लग़्ज़िशों पे मेरी मुस्कुराए हैं क्या क्या
ख़ुदा ही जाने 'यगाना' मैं कौन हूँ क्या हूँ
ख़ुद अपनी ज़ात पे शक दिल में आए हैं क्या क्या
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ज़माना ख़ुदा को ख़ुदा जानता है
यही जानता है तो क्या जानता है
यही जानता है तो क्या जानता है
इसी में दिल अपना भला जानता है
कि इक नाख़ुदा को ख़ुदा जानता है
वो क्यूँ सर खपाए तिरी जुस्तुजू में
जो अंजाम-ए-फ़िक्र-ए-रसा जानता है
ख़ुदा ऐसे बंदे से क्यूँ फिर न जाए
जो बैठा दुआ माँगना जानता है
ज़हे सहव-ए-कातिब कि सारा ज़माना
मुझी को सरापा ख़ता जानता है
अनोखा गुनहगार ये सादा इंसाँ
नविश्ते को अपना किया जानता है
'यगाना' तू ही जाने अपनी हक़ीक़त
तुझे कौन तेरे सिवा जानता है
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मुझे दिल की ख़ता पर 'यास' शरमाना नहीं आता
पराया जुर्म अपने नाम लिखवाना नहीं आता
पराया जुर्म अपने नाम लिखवाना नहीं आता
मुझे ऐ नाख़ुदा आख़िर किसी को मुँह दिखाना है
बहाना कर के तन्हा पार उतर जाना नहीं आता
मुसीबत का पहाड़ आख़िर किसी दिन कट ही जाएगा
मुझे सर मार कर तेशे से मर जाना नहीं आता
दिल-ए-बे-हौसला है इक ज़रा सी ठेस का मेहमाँ
वो आँसू क्या पिएगा जिस को ग़म खाना नहीं आता
सरापा राज़ हूँ मैं क्या बताऊँ कौन हूँ क्या हूँ
समझता हूँ मगर दुनिया को समझाना नहीं आता
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