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चाहता ये हूँ कि बेनाम-ओ-निशाँ हो जाऊँ
शाम की तरह जलूँ और धुआँ हो जाऊँ
शाम की तरह जलूँ और धुआँ हो जाऊँ
पहले दहलीज़ पे रौशन करूँ आँखों के चराग़
और फिर ख़ुद किसी पर्दे में निहाँ हो जाऊँ
तोड़ कर फेंक दूँ ये फ़िरक़ा-परस्ती के महल
और पेशानी पे सज्दे का निशाँ हो जाऊँ
दिल से फिर दर्द महकने की सदाएँ उट्ठें
काश ऐसा हो मैं तेरी रग-ए-जाँ हो जाऊँ
बस तिरे ज़िक्र में कट जाएँ मिरे रोज़-ओ-शब
नूर की शाख़ पे चिड़ियों की ज़बाँ हो जाऊँ
ख़ाक जिस कूचे की मलते हैं फ़रिश्ते आ कर
मैं उसी ख़ाक के ज़र्रों में निहाँ हो जाऊँ
मेरी आवारा-मिज़ाजी को सुकूँ मिल जाए
दर्द बन कर तिरे सीने में रवाँ हो जाऊँ
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लाखों सद
में ढेरों ग़म फिर भी नहीं हैं आँखें नम
में ढेरों ग़म फिर भी नहीं हैं आँखें नम
इक मुद्दत से रोए नहीं क्या पत्थर के हो गए हम
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लाखों सद
में ढेरों ग़म, फिर भी नहीं हैं आँखें नम
में ढेरों ग़म, फिर भी नहीं हैं आँखें नम
इक मुद्दत से रोए नहीं, क्या पत्थर के हो गए हम
यूँ पलकों पे हैं आँसू, जैसे फूलों पर शबनम
ख़्वाब में वो आ जाते हैं, इतना तो रखते हैं भरम
हम उस बस्ती में हैं जहाँ, धूप ज़ियादा साए कम
अब ज़ख़्मों में ताब नहीं, अब क्यूँ लाए हो मरहम
Read Fullयूँ पलकों पे हैं आँसू, जैसे फूलों पर शबनम
ख़्वाब में वो आ जाते हैं, इतना तो रखते हैं भरम
हम उस बस्ती में हैं जहाँ, धूप ज़ियादा साए कम
अब ज़ख़्मों में ताब नहीं, अब क्यूँ लाए हो मरहम
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हम को दिल से भी निकाला गया फिर शहर से भी
हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
हम को पत्थर से भी मारा गया फिर ज़हरस भी
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