गुलाब ख़्वाब दवा ज़हर जाम क्या क्या है
मैं आ गया हूँ बता इंतिज़ाम क्या क्या है
ज़बाँ तो खोल नज़र तो मिला जवाब तो दे
मैं कितनी बार लुटा हूँ मुझे हिसाब तो दे
तेरे बदन की लिखावट में है उतार चढ़ाव
मैं तुझे कैसे पढूँगा मुझे किताब तो दे
तेरा सवाल है साक़ी कि ज़िंदगी क्या है?
जवाब देता हूँ पहले मुझे शराब तो दे
रास्ते में फिर वही पैरों का चक्कर आ गया
जनवरी गुज़रा नहीं था और दिसंबर आ गया
ये शरारत है, सियासत है, के है साज़िश कोई
शाख़ पर फल आयें इससे पहले पत्थर आ गया
मैने कुछ पानी बचा रखा था अपनी आँख में
एक समंदर अपने सूखे होंठ लेकर आ गया
अपने दरवाज़े पे मैंने पहले खुद आवाज़ दी
और फिर कुछ देर में खुद ही निकल कर आ गया
मैने बस्ती में कदम रखा तो यू लगा
जैसे जंगल मेरे पैरो से लिपट कर आ गया
पांव के ठोकर में जिस के तेरे तख्तों ताज है
शाह से जा कर कोई कह दे कलंदर आ गया
झूठों ने झूठों से कहा है सच बोलो
सरकारी एलान हुआ है सच बोलो
घर के अंदर तो झूठों की एक मंडी है
दरवाज़े पर लिखा हुआ है सच बोलो
गुलदस्ते पर यकजहती लिख रक्खा है
गुलदस्ते के अंदर क्या है सच बोलो
गंगा मइया डूबने वाले अपने थे
नाव में किसने छेद किया है सच बोलो
बुलाती है मगर जाने का नहीं
ये दुनिया है इधर जाने का नहीं
मेरे बेटे किसी से इश्क़ कर
मगर हद से गुज़र जाने का नहीं
ज़मीं भी सर पे रखनी हो तो रखो
चले हो तो ठहर जाने का नहीं
सितारे नोच कर ले जाऊंगा
मैं खाली हाथ घर जाने का नहीं
वबा फैली हुई है हर तरफ
अभी माहौल मर जाने का नहीं
वो गर्दन नापता है नाप ले
मगर जालिम से डर जाने का नहीं
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते
अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के
जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते
रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना
हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते
मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था
तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते
मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद
लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते
हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते