जिन पे होता है बहुत दिल को भरोसा 'ताबिश'
वक़्त पड़ने पे वही लोग दग़ा देते हैं
वक़्त पड़ने पे वही लोग दग़ा देते हैं
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दोस्त क्या ख़ूब वफ़ाओं का सिला देते हैं
हर नए मोड़ पर एक ज़ख़्म नया देते हैं
हर नए मोड़ पर एक ज़ख़्म नया देते हैं
तुम से तो ख़ैर घड़ी-भर की मुलाक़ात रही
लोग सदियों की रफ़ाक़त को भुला देते हैं
कैसे मुमकिन है कि धुआँ भी न हो और दिल भी जले
चोट पड़ती है तो पत्थर भी सदा देते हैं
कौन होता है मुसीबत में किसी का ऐ दोस्त
आग लगती है तो पत्ते भी हवा देते हैं
जिन पे होता है बहुत दिल को भरोसा 'ताबिश'
वक़्त पड़ने पे वही लोग दग़ा देते हैं
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एक जल्वा ब-सद अंदाज़-ए-नज़र देख लिया
तुझ को ही देखा किए तुझ को अगर देख लिया
तुझ को ही देखा किए तुझ को अगर देख लिया
जैसे सर फोड़ के मिल जाएगी ज़िंदाँ से नजात
क्या जुनूँ ने कोई दीवार में दर देख लिया
बाज़ है आज तलक दीदा-ए-हैराँ की तरह
दश्त-ए-वहशत ने किसे ख़ाक-बसर देख लिया
जुर्म-ए-नज़्ज़ारा की पाता है सज़ा दिल अब तक
अहल-ए-दिल देख लिया अहल-ए-नज़र देख लिया
सूरत-ए-नक़्श-ए-क़दम दीदा-ए-मुश्ताक़ हैं हम
जब भी वो आया सर-ए-राहगुज़र देख लिया
यही हसरत है कि वो एक नज़र देख तो ले
और उस ने कभी इस सम्त अगर देख लिया
कहीं पर्दा है तजल्ली कहीं जल्वा है हिजाब
ये तमाशा भी तिरा ज़ौक़-ए-नज़र देख लिया
रोज़ इक ताज़ा ग़म-ए-दहर है नाज़िल 'ताबिश'
एक तूफ़ान-ए-बला ने मिरा घर देख लिया
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ताबिश' हवस-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार कहाँ तक
राहत से ये ग़म फिर भी मिरे यार कहाँ तक
राहत से ये ग़म फिर भी मिरे यार कहाँ तक
हर रोज़ इक आवाज़ा अनल-हक़ का लगाएँ
देखें तो कि है सिलसिला-ए-दार कहाँ तक
हर रास्ते से मंज़िल-ए-हस्ती है बहुत दूर
जाएगा मिरे साथ ग़म-ए-यार कहाँ तक
हाँ ताना-ए-अग़्यार के नश्तर ही से खुल जाए
इक ज़ख़्म रहेगा लब-ए-गुफ़्तार कहाँ तक
हैं इस के तअ'ल्लुक़ से अज़ीज़ अहल-ए-जहाँ भी
ले जाएगी आख़िर हवस-ए-यार कहाँ तक
आईना-दर-आईना दर-आईना तिरा हुस्न
हैराँ हों तिरे तालिब-ए-दीदार कहाँ तक
होती ही नहीं सुब्ह-ए-क़यामत भी नुमूदार
जागेंगे शब-ए-हिज्र के बीमार कहाँ तक
फैली हुई हर सम्त कड़ी धूप है 'ताबिश'
जाएगा कोई साया-ए-दीवार कहाँ तक
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हमा-तन गोश इक ज़माना था
मेरे लब पर तिरा फ़साना था
मेरे लब पर तिरा फ़साना था
काश दिल ही ज़रा ठहर जाता
गर्दिशों में अगर ज़माना था
हम थे और ए'तिमाद-ए-फ़स्ल-ए-बहार
शाख़ शाख़ अपना आशियाना था
वो बहारें भी हम पे गुज़री हैं
जब क़फ़स था न आशियाना था
दिल की उम्मीदवारियाँ न गईं
उस करम का कोई ठिकाना था
सुब्ह से पहले बुझ गया 'ताबिश'
एक दिल ही चराग़-ए-ख़ाना था
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