जब रात की नागिन डसती है
नस नस में ज़हर उतरता है
जब चाँद की किरनें तेज़ी से
उस दिल को चीर के आती हैं
जब आँख के अंदर ही आँसू
सब जज़्बों पर छा जाते हो
तब याद बहुत तुम आते हो
जब दर्द की झानजर बजती है
जब रक़्स ग़मों का होता है
ख़्वाबों की ताल पे सारे दुख
वहशत के साज़ बजाते हैं
गाते हैं ख़्वाहिश की लय में
मस्ती में झूमते जाते हैं
सब जज़्बों पर छा जाते हो
तब याद बहुत तुम आते हो
कल हमेशा की तरह उस ने कहा ये फ़ोन पर
मैं बहुत मसरूफ़ हूँ मुझ को बहुत से काम हैं
इस लिए तुम आओ मिलने मैं तो आ सकती नहीं
हर रिवायत तोड़ कर इस बार मैं ने कह दिया
तुम जो हो मसरूफ़ तो मैं भी बहुत मसरूफ़ हूँ
तुम जो हो मशहूर तो मैं भी बहुत मारूफ़ हूँ
तुम अगर ग़मगीन हो मैं भी बहुत रंजूर हूँ
तुम थकन से चूर तो मैं भी थकन से चूर हूँ
जान-ए-मन है वक़्त मेरा भी बहुत ही क़ीमती
कुछ पुराने दोस्तों ने मिलने आना है अभी
मैं भी अब फ़ारिग़ नहीं मुझ को भी लाखों काम हैं
वर्ना कहने को तो सब लम्हे तुम्हारे नाम हैं
मेरी आँखें भी बहुत बोझल हैं सोना है मुझे
रतजगों के बा'द अब नींदों में खोना है मुझे
मैं लहू अपनी अनाओं का बहा सकता नहीं
तुम नहीं आतीं तो मिलने मैं भी आ सकता नहीं
उस को ये कह के 'वसी' मैं ने रिसीवर रख दिया
और फिर अपनी अना के पाँव पे सर रख दिया
काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता
तू बड़े प्यार से चाव से बड़े मान के साथ
अपनी नाज़ुक सी कलाई में चढ़ाती मुझ को
और बेताबी से फ़ुर्क़त के ख़िज़ाँ लम्हों में
तू किसी सोच में डूबी जो घुमाती मुझ को
मैं तिरे हाथ की ख़ुश्बू से महक सा जाता
जब कभी मूड में आ कर मुझे चूमा करती
तेरे होंटों की में हिद्दत से दहक सा जाता
रात को जब भी तू नींदों के सफ़र पर जाती
मरमरीं हाथ का इक तकिया बनाया करती
मैं तिरे कान से लग कर कई बातें करता
तेरी ज़ुल्फ़ों को तिरे गाल को चूमा करता
जब भी तू बंद-ए-क़बा खोलने लगती जानाँ
अपनी आँखों को तिरे हुस्न से ख़ीरा करता
मुझ को बेताब सा रखता तिरी चाहत का नशा
मैं तिरी रूह के गुलशन में महकता रहता
मैं तिरे जिस्म के आँगन में खनकता होता
कुछ नहीं तो यही बे-नाम सा बंधन होता
काश मैं तेरे हसीं हाथ का कंगन होता
समंदर में उतरता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तिरी आँखों को पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तुम्हारा नाम लिखने की इजाज़त छिन गई जब से
कोई भी लफ़्ज़ लिखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तिरी यादों की ख़ुश्बू खिड़कियों में रक़्स करती है
तिरे ग़म में सुलगता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
न जाने हो गया हूँ इस क़दर हस्सास मैं कब से
किसी से बात करता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
मैं सारा दिन बहुत मसरूफ़ रहता हूँ मगर ज्यूँ ही
क़दम चौखट पे रखता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
हर इक मुफ़्लिस के माथे पर अलम की दास्ताने हैं
कोई चेहरा भी पढ़ता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
बड़े लोगों के ऊँचे बद-नुमा और सर्द महलों को
ग़रीब आँखों से तकता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
तिरे कूचे से अब मेरा तअ'ल्लुक़ वाजिबी सा है
मगर जब भी गुज़रता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं
हज़ारों मौसमों की हुक्मरानी है मिरे दिल पर
'वसी' मैं जब भी हँसता हूँ तो आँखें भीग जाती हैं