हमें पसंद सही अब ये रंग मत पहनो
    पराए तन पे हमारी उमंग मत पहनो

    हमारी रूह पे पड़ती हैं बदनुमा शिकनें
    लिबास पहनो मगर इतना तंग मत पहनो

    Liyaqat Ali Aasim
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    हम ने तुझे देखा नहीं क्या ईद मनाएँ
    जिस ने तुझे देखा हो उसे ईद मुबारक

    Liyaqat Ali Aasim
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    गुज़िश्ता साल कोई मस्लहत रही होगी
    गुज़िश्ता साल के सुख अब के साल दे मौला

    Liyaqat Ali Aasim
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    मिले तो काश मिरा हाथ थाम कर ले जाए
    वो अपने घर न सही मुझ को मेरे घर ले जाए

    बुतान-ए-शहर तुम्हारे लरज़ते हाथों में
    कोई तो संग हो ऐसा कि मेरा सर ले जाए

    दिया करूँगा यूँही तेरे नाम की दस्तक
    मिरा नसीब मुझे लाख दर-ब-दर ले जाए

    वो आदमी हो कि ख़ुशबू बहुत ही रुस्वा है
    हवा-ए-शहर जिसे अपने दोश पर ले जाए

    मिरे क़रीब से गुज़रे तो अहल-ए-दिल बोले
    उठा के कौन परिंदा लहू में तर ले जाए

    पलट के आए तो शायद न कुछ दिखाई दे
    वो जा रहा है तो 'आसिम' मिरी नज़र ले जाए

    Liyaqat Ali Aasim
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    ख़्वाब ताबीर में ढलते हैं यहाँ से आगे
    आ निकल जाएँ शब-ए-वहम-ओ-गुमाँ से आगे

    रंग पैराहन-ए-ख़ाकी का बदलने के लिए
    मुझ को जाना है अभी रेग-ए-रवाँ से आगे

    इक क़दम और सही शहर-ए-तनफ़्फ़ुस से उधर
    इक सफ़र और सही कूचा-ए-जाँ से आगे

    इस सफ़र से कोई लौटा नहीं किस से पूछें
    कैसी मंज़िल है जहान-ए-गुज़राँ से आगे

    मैं बहुत तेज़ हवाओं की गुज़रगाह में हूँ
    एक बस्ती है कहीं मेरे मकाँ से आगे

    मेरी आवारगी यूँ ही तो नहीं है 'आसिम'
    कोई ख़ुशबू है मिरी उम्र-ए-रवाँ से आगे

    Liyaqat Ali Aasim
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    मेहराब-ए-ख़ुश-क़याम से आगे निकल गई
    वहशत दिए की शाम से आगे निकल गई

    ख़ल्वत के फ़ासले से न बैठूँ तो क्या करूँ
    महफ़िल ही एहतिमाम से आगे निकल गई

    फ़ारिग़ न जानिए मुझे मसरूफ़-ए-जंग हूँ
    उस चुप से जो कलाम से आगे निकल गई

    तुम साथ हो तो धूप का एहसास तक नहीं
    ये दोपहर तो शाम से आगे निकल गई

    जब मारका हुआ तो मेरी तेग़-ए-दर-गुज़र
    शमशीर-ए-इंतिक़ाम से आगे निकल गई

    मरने का कोई ख़ौफ़ न जीने की आरज़ू
    क्या ज़िंदगी दवाम से आगे निकल गई

    'आसिम' वो कोई दोस्त नहीं था जो ठहरता
    दुनिया थी अपने काम से आगे निकल गई

    Liyaqat Ali Aasim
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    न अब मुझ को सदा दो थक गया मैं
    तुम्ही जाओ इरादो थक गया हूँ

    नहीं उट्ठी मिरी तलवार मुझ से
    उठो ऐ शाह-ज़ादो थक गया हूँ

    ज़रा सा साथ दो ग़म के सफ़र में
    ज़रा सा मुस्कुरा दो थक गया हूँ

    तुम्हारे साथ हूँ फिर भी अकेला
    रफ़ीक़ो रास्ता दो थक गया हूँ

    कहाँ तक एक ही तमसील देखूँ
    बस अब पर्दा गिरा दो थक गया हूँ

    Liyaqat Ali Aasim
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    कहीं ऐसा न हो दामन जला लो
    हमारे आँसुओं पर ख़ाक डालो

    मनाना ही ज़रूरी है तो फिर तुम
    हमें सब से ख़फ़ा हो कर मना लो

    बहुत रोई हुई लगती हैं आँखें
    मिरी ख़ातिर ज़रा काजल लगा लो

    अकेले-पन से ख़ौफ़ आता है मुझ को
    कहाँ हो ऐ मिरे ख़्वाबो ख़यालो

    बहुत मायूस बैठा हूँ मैं तुम से
    कभी आ कर मुझे हैरत में डालो

    Liyaqat Ali Aasim
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    कोई आस-पास नहीं रहा तो ख़याल तेरी तरफ़ गया
    मुझे अपना हाथ भी छू गया तो ख़याल तेरी तरफ़ गया

    कोई आ के जैसे चला गया कोई जा के जैसे गया नहीं
    मुझे अपना घर कभी घर लगा तो ख़याल तेरी तरफ़ गया

    मिरी बे-कली थी शगुफ़्तगी सो बहार मुझ से लिपट गई
    कहा वहम ने कि ये कौन था तो ख़याल तेरी तरफ़ गया

    मुझे कब किसी की उमंग थी मिरी अपने आप से जंग थी
    हुआ जब शिकस्त का सामना तो ख़याल तेरी तरफ़ गया

    किसी हादसे की ख़बर हुई तो फ़ज़ा की साँस उखड़ गई
    कोई इत्तिफ़ाक़ से बच गया तो ख़याल तेरी तरफ़ गया

    तिरे हिज्र में ख़ुर-ओ-ख़्वाब का कई दिन से है यही सिलसिला
    कोई लुक़्मा हाथ से गिर पड़ा तो ख़याल तेरी तरफ़ गया

    मिरे इख़्तियार की शिद्दतें मिरी दस्तरस से निकल गईं
    कभी तू भी सामने आ गया तो ख़याल तेरी तरफ़ गया

    Liyaqat Ali Aasim
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    तू न था तेरी तमन्ना देखने की चीज़ थी
    दिल न माना वर्ना दुनिया देखने की चीज़ थी

    क्या ख़बर मेरे जुनूँ को शहर क्यूँ रास आ गया
    ऐसे आलम में तो सहरा देखने की चीज़ थी

    तुम को ऐ आँखो कहाँ रखता मैं कुंज-ए-ख़्वाब में
    हुस्न था और हुस्न तन्हा देखने की चीज़ थी

    लम्स की लौ में पिघलता हुज्रा-ए-ज़ात-ओ-सिफ़ात
    तुम भी होते तो अंधेरा देखने की चीज़ थी

    आ गया मेरे मकाँ तक और आ कर रह गया
    बारिशों के ब'अद दरिया देखने की चीज़ थी

    धूप कहती ही रही मैं धूप हूँ मैं धूप हूँ
    अपने साए पर भरोसा देखने की चीज़ थी

    शाम के साए में जैसे पेड़ का साया मिले
    मेरे मिटने का तमाशा देखने की चीज़ थी

    Liyaqat Ali Aasim
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