Aanis Moin

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    आज की रात न जाने कितनी लंबी होगी
    आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है

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    बाहर भी अब अंदर जैसा सन्नाटा है
    दरिया के उस पार भी गहरा सन्नाटा है

    शोर थमे तो शायद सदियाँ बीत चुकी हैं
    अब तक लेकिन सहमा सहमा सन्नाटा है

    किस से बोलूँ ये तो इक सहरा है जहाँ पर
    मैं हूँ या फिर गूँगा बहरा सन्नाटा है

    जैसे इक तूफ़ान से पहले की ख़ामोशी
    आज मिरी बस्ती में ऐसा सन्नाटा है

    नई सहर की चाप न जाने कब उभरेगी
    चारों जानिब रात का गहरा सन्नाटा है

    सोच रहे हो सोचो लेकिन बोल न पड़ना
    देख रहे हो शहर में कितना सन्नाटा है

    महव-ए-ख़्वाब हैं सारी देखने वाली आँखें
    जागने वाला बस इक अंधा सन्नाटा है

    डरना है तो अन-जानी आवाज़ से डरना
    ये तो 'आनिस' देखा-भाला सन्नाटा है

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    वो कुछ गहरी सोच में ऐसे डूब गया है
    बैठे बैठे नदी किनारे डूब गया है

    आज की रात न जाने कितनी लम्बी होगी
    आज का सूरज शाम से पहले डूब गया है

    वो जो प्यासा लगता था सैलाब-ज़दा था
    पानी पानी कहते कहते डूब गया है

    मेरे अपने अंदर एक भँवर था जिस में
    मेरा सब कुछ साथ ही मेरे डूब गया है

    शोर तो यूँ उट्ठा था जैसे इक तूफ़ाँ हो
    सन्नाटे में जाने कैसे डूब गया है

    आख़िरी ख़्वाहिश पूरी कर के जीना कैसा
    'आनस' भी साहिल तक आ के डूब गया है

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    वो मेरे हाल पे रोया भी मुस्कुराया भी
    अजीब शख़्स है अपना भी है पराया भी

    ये इंतिज़ार सहर का था या तुम्हारा था
    दिया जलाया भी मैं ने दिया बुझाया भी

    मैं चाहता हूँ ठहर जाए चश्म-ए-दरिया में
    लरज़ता अक्स तुम्हारा भी मेरा साया भी

    बहुत महीन था पर्दा लरज़ती आँखों का
    मुझे दिखाया भी तू ने मुझे छुपाया भी

    बयाज़ भर भी गई और फिर भी सादा है
    तुम्हारे नाम को लिक्खा भी और मिटाया भी

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    बिखर के फूल फ़ज़ाओं में बास छोड़ गया
    तमाम रंग यहीं आस-पास छोड़ गया

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    अजब अंदाज़ से ये घर गिरा है
    मिरा मलबा मिरे ऊपर गिरा है

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    हैरत से जो यूँ मेरी तरफ़ देख रहे हो
    लगता है कभी तुम ने समुंदर नहीं देखा

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    था इंतिज़ार मनाएँगे मिल के दीवाली
    न तुम ही लौट के आए न वक़्त-ए-शाम हुआ

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    मुमकिन है कि सदियों भी नज़र आए न सूरज
    इस बार अंधेरा मिरे अंदर से उठा है

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    हमारी मुस्कुराहट पर न जाना
    दिया तो क़ब्र पर भी जल रहा है

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