Adil Mansuri

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    सोए हुए पलंग के साए जगा गया
    खिड़की खुली तो आसमाँ कमरे में आ गया

    आँगन में तेरी याद का झोंका जो आ गया
    तन्हाई के दरख़्त से पत्ते उड़ा गया

    हँसते चमकते ख़्वाब के चेहरे भी मिट गए
    बत्ती जली तो मन में अंधेरा सा छा गया

    आया था काले ख़ून का सैलाब पिछली रात
    बरसों पुरानी जिस्म की दीवार ढा गया

    तस्वीर में जो क़ैद था वो शख़्स रात को
    ख़ुद ही फ़्रेम तोड़ के पहलू में आ गया

    वो चाय पी रहा था किसी दूसरे के साथ
    मुझ पर निगाह पड़ते ही कुछ झेंप सा गया

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    मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
    ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूँ

    हुदूद-ए-वक़्त से बाहर अजब हिसार में हूँ
    मैं एक लम्हा हूँ सदियों के इंतिज़ार में हूँ

    अभी न कर मिरी तश्कील मुझ को नाम न दे
    तिरे वजूद से बाहर में किस शुमार में हूँ

    मैं एक ज़र्रा मिरी हैसियत ही क्या है मगर
    हवा के साथ हूँ उड़ते हुए ग़ुबार में हूँ

    बस आस-पास ये सूरज है और कुछ भी नहीं
    महक रहा तो हूँ लेकिन मैं रेगज़ार में हूँ

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    मुझे पसंद नहीं ऐसे कारोबार में हूँ
    ये जब्र है कि मैं ख़ुद अपने इख़्तियार में हूँ

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    दरिया के किनारे पे मिरी लाश पड़ी थी
    और पानी की तह में वो मुझे ढूँड रहा था

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    फूलों की सेज पर ज़रा आराम क्या किया
    उस गुल-बदन पे नक़्श उठ आए गुलाब के

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    जो चुप-चाप रहती थी दीवार पर
    वो तस्वीर बातें बनाने लगी

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    क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो
    तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो

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    कोई ख़ुद-कुशी की तरफ़ चल दिया
    उदासी की मेहनत ठिकाने लगी

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    चुप-चाप बैठे रहते हैं कुछ बोलते नहीं
    बच्चे बिगड़ गए हैं बहुत देख-भाल से

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    किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
    काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के

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