तुम से बढ़कर कौन दुनिया में मेरे नज़दीक है
इक तुम्हीं तो हो कि जिसका दिल दुखा सकता हूँ मैं
आइने का साथ प्यारा था कभी
एक चेहरे पर गुज़ारा था कभी
आज सब कहते हैं जिस को नाख़ुदा
हम ने उस को पार उतारा था कभी
ये मिरे घर की फ़ज़ा को क्या हुआ
कब यहाँ मेरा तुम्हारा था कभी
था मगर सब कुछ न था दरिया के पार
इस किनारे भी किनारा था कभी
कैसे टुकड़ों में उसे कर लूँ क़ुबूल
जो मिरा सारे का सारा था कभी
आज कितने ग़म हैं रोने के लिए
इक तिरे दुख का सहारा था कभी
जुस्तुजू इतनी भी बे-मा'नी न थी
मंज़िलों ने भी पुकारा था कभी
ये नए गुमराह क्या जानें मुझे
मैं सफ़र का इस्तिआ'रा था कभी
इश्क़ के क़िस्से न छेड़ो दोस्तो
मैं इसी मैदाँ में हारा था कभी
रोना हो आसान हमारा
इतना कर नुक़्सान हमारा
बात नहीं करनी तो मत कर
चेहरा तो पहचान हमारा
तेरे ही लिए आएँगे तेरे पास
किसी से बिछड़कर नहीं आएँगे
बुरा मानिए तो बुरा मानिए
इजाज़त तो लेकर नहीं आएँगे
"नज़्म"
इक बरस और कट गया 'शारिक़'
रोज़ साँसों की जंग लड़ते हुए
सब को अपने ख़िलाफ़ करते हुए
यार को भूलने से डरते हुए
और सब से बड़ा कमाल है ये
साँसें लेने से दिल नहीं भरता
अब भी मरने को जी नहीं करता