Jawwad Sheikh

Top 10 of Jawwad Sheikh

    तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ
    जहाँ भी जो भी है तेरे अलावा भूल जाऊँ

    तो क्या ये दूसरा ही इश्क़ असली इश्क़ समझूँ
    तो पहला तजरबे की देन में था भूल जाऊँ

    तो क्या इतना ही आसाँ है किसी को भूल जाना
    कि बस बातों ही बातों में भुलाता भूल जाऊँ

    कभी कहता हूँ उसको याद रखना ठीक होगा
    मगर फिर सोचता हूँ फ़ाएदा क्या भूल जाऊँ

    ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई गई हो
    मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ

    है इतनी जुज़इयात इस सानहे की पूछिए मत
    मैं क्या क्या याद रक्खूँ और क्या क्या भूल जाऊँ

    कोई कब तक किसी की बेवफ़ाई याद रक्खे
    बहुत मुमकिन है मैं भी रफ़्ता रफ़्ता भूल जाऊँ

    तो क्या ये कह के ख़ुद को मुतमइन कर लोगे 'जव्वाद'
    कि वो है भी इसी लाइक़ लिहाज़ा भूल जाऊँ

    Jawwad Sheikh
    40 Likes

    अब हमें देख के लगता तो नहीं है लेकिन
    हम कभी उसके पसंदीदा हुआ करते थे

    Jawwad Sheikh
    79 Likes

    मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता
    या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं

    Jawwad Sheikh
    84 Likes

    ये नहीं है कि वो एहसान बहुत करता है
    अपने एहसान का एलान बहुत करता है

    आप इस बात को सच ही न समझ लीजिएगा
    वो मेरी जान मेरी जान बहुत करता है

    Jawwad Sheikh
    64 Likes

    कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है
    फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है

    तुझसे जब मिलकर भी उदासी कम नहीं होती
    तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है

    Jawwad Sheikh
    159 Likes

    आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं
    लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं

    आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर
    इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं

    मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता
    या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं

    कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँ जाना है
    हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं

    हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ
    ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं

    फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है
    जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं

    अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ
    मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं

    मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद'
    ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं

    Jawwad Sheikh
    49 Likes

    कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है
    फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है

    कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है
    एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है

    तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती
    तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है

    यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है
    लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है

    कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है
    दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है

    हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ
    वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है

    कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ
    बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है

    Jawwad Sheikh
    38 Likes

    मैंने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो
    लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो

    तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ
    तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो

    अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझको
    ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो

    ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या
    और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो

    ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं
    मैंने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो

    Jawwad Sheikh
    49 Likes

    नही है मुन्हसिर इस बात पर यारी हमारी
    के तू करता रहे नाहक तरफदारी हमारी

    अंधेरे मे हमे रखना तो खामोशी से रखना
    कही बेदार ना हो जाये बेदारी हमारी

    मगर अच्छा तो ये होता हम एक साथ रहते
    भरी रहती तेरे कपड़ो से अल्मारी हमारी

    हम आसानी से खुल जाये मगर एक मसला है
    तुम्हारी सतह से ऊपर है तहदारी हमारी

    कहानीकार ने किरदार ही ऐसा दिया है
    अदाकारी नही लगती अदाकारी हमारी

    हमे जीते चले जाने पर माइल करने वाली
    यहा कोई नही लेकिन सुखनकारी हमारी

    Jawwad Sheikh
    26 Likes

    अपने सामान को बाँधे हुए इस सोच में हूँ
    जो कहीं के नहीं रहते वो कहाँ जाते हैं

    Jawwad Sheikh
    83 Likes

Top 10 of Similar Writers