तो क्या ये आख़िरी ख़्वाहिश है अच्छा भूल जाऊँ
जहाँ भी जो भी है तेरे अलावा भूल जाऊँ
तो क्या ये दूसरा ही इश्क़ असली इश्क़ समझूँ
तो पहला तजरबे की देन में था भूल जाऊँ
तो क्या इतना ही आसाँ है किसी को भूल जाना
कि बस बातों ही बातों में भुलाता भूल जाऊँ
कभी कहता हूँ उसको याद रखना ठीक होगा
मगर फिर सोचता हूँ फ़ाएदा क्या भूल जाऊँ
ये कोई क़त्ल थोड़ी है कि बात आई गई हो
मैं और अपना नज़र-अंदाज़ होना भूल जाऊँ
है इतनी जुज़इयात इस सानहे की पूछिए मत
मैं क्या क्या याद रक्खूँ और क्या क्या भूल जाऊँ
कोई कब तक किसी की बेवफ़ाई याद रक्खे
बहुत मुमकिन है मैं भी रफ़्ता रफ़्ता भूल जाऊँ
तो क्या ये कह के ख़ुद को मुतमइन कर लोगे 'जव्वाद'
कि वो है भी इसी लाइक़ लिहाज़ा भूल जाऊँ
ये नहीं है कि वो एहसान बहुत करता है
अपने एहसान का एलान बहुत करता है
आप इस बात को सच ही न समझ लीजिएगा
वो मेरी जान मेरी जान बहुत करता है
कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है
फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है
तुझसे जब मिलकर भी उदासी कम नहीं होती
तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
आप जैसों के लिए इस में रखा कुछ भी नहीं
लेकिन ऐसा तो न कहिए कि वफ़ा कुछ भी नहीं
आप कहिए तो निभाते चले जाएँगे मगर
इस तअ'ल्लुक़ में अज़िय्यत के सिवा कुछ भी नहीं
मैं किसी तरह भी समझौता नहीं कर सकता
या तो सब कुछ ही मुझे चाहिए या कुछ भी नहीं
कैसे जाना है कहाँ जाना है क्यूँ जाना है
हम कि चलते चले जाते हैं पता कुछ भी नहीं
हाए इस शहर की रौनक़ के मैं सदक़े जाऊँ
ऐसी भरपूर है जैसे कि हुआ कुछ भी नहीं
फिर कोई ताज़ा सुख़न दिल में जगह करता है
जब भी लगता है कि लिखने को बचा कुछ भी नहीं
अब मैं क्या अपनी मोहब्बत का भरम भी न रखूँ
मान लेता हूँ कि उस शख़्स में था कुछ भी नहीं
मैं ने दुनिया से अलग रह के भी देखा 'जव्वाद'
ऐसी मुँह-ज़ोर उदासी की दवा कुछ भी नहीं
कोई इतना प्यारा कैसे हो सकता है
फिर सारे का सारा कैसे हो सकता है
कैसे किसी की याद हमें ज़िंदा रखती है
एक ख़याल सहारा कैसे हो सकता है
तुझ से जब मिल कर भी उदासी कम नहीं होती
तेरे बग़ैर गुज़ारा कैसे हो सकता है
यार हवा से कैसे आग भड़क उठती है
लफ़्ज़ कोई अँगारा कैसे हो सकता है
कौन ज़माने-भर की ठोकरें खा कर ख़ुश है
दर्द किसी को प्यारा कैसे हो सकता है
हम भी कैसे एक ही शख़्स के हो कर रह जाएँ
वो भी सिर्फ़ हमारा कैसे हो सकता है
कैसे हो सकता है जो कुछ भी मैं चाहूँ
बोल ना मेरे यारा कैसे हो सकता है
मैंने चाहा तो नहीं था कि कभी ऐसा हो
लेकिन अब ठान चुके हो तो चलो अच्छा हो
तुम से नाराज़ तो मैं और किसी बात पे हूँ
तुम मगर और किसी वजह से शर्मिंदा हो
अब कहीं जा के ये मालूम हुआ है मुझको
ठीक रह जाता है जो शख़्स तेरे जैसा हो
ऐसे हालात में हो भी कोई हस्सास तो क्या
और बे-हिस भी अगर हो तो कोई कितना हो
ताकि तू समझे कि मर्दों के भी दुख होते हैं
मैंने चाहा भी यही था कि तेरा बेटा हो
नही है मुन्हसिर इस बात पर यारी हमारी
के तू करता रहे नाहक तरफदारी हमारी
अंधेरे मे हमे रखना तो खामोशी से रखना
कही बेदार ना हो जाये बेदारी हमारी
मगर अच्छा तो ये होता हम एक साथ रहते
भरी रहती तेरे कपड़ो से अल्मारी हमारी
हम आसानी से खुल जाये मगर एक मसला है
तुम्हारी सतह से ऊपर है तहदारी हमारी
कहानीकार ने किरदार ही ऐसा दिया है
अदाकारी नही लगती अदाकारी हमारी
हमे जीते चले जाने पर माइल करने वाली
यहा कोई नही लेकिन सुखनकारी हमारी