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Kafeel Aazar Amrohvi

Top 10 of Kafeel Aazar Amrohvi

Kafeel Aazar Amrohvi

Top 10 of Kafeel Aazar Amrohvi

    कमरे में फैलता रहा सिगरेट का धुआँ
    मैं बंद खिड़कियों की तरफ़ देखता रहा
    Kafeel Aazar Amrohvi
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    ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ
    नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा
    ऐसे बद-बख़्त ज़माने में हज़ारों होंगे
    जिन को लोरी भी मुयस्सर नहीं आती होगी
    मेरी लोरी से तिरी भूक नहीं मिट सकती
    मैं ने माना कि तुझे भूक सताती होगी

    लेकिन ऐ मेरी उमीदों के हसीं ताज-महल
    मैं तिरी भूक को लोरी ही सुना सकती हूँ
    तेरा रह रह के ये रोना नहीं देखा जाता
    अब तुझे दूध नहीं ख़ून पिला सकती हूँ

    भूक तो तेरा मुक़द्दर है ग़रीबी की क़सम
    भूक की आग में जल जल के ये रोना कैसा
    तू तो आदी है इसी तरह से सो जाने का
    भूक की गोद में फिर आज न सोना कैसा

    आज की रात फ़क़त तू ही नहीं तेरी तरह
    और कितने हैं जिन्हें भूक लगी है बेटे
    रोटियाँ बंद हैं सरमाए के तह-ख़ानों में
    भूक इस मुल्क के खेतों में उगी है बेटे

    लोग कहते हैं कि इस मुल्क के ग़द्दारों ने
    सिर्फ़ महँगाई बढ़ाने को छुपाया है अनाज
    ऐसे नादार भी इस मुल्क में सो जाते हैं
    हल चलाए हैं जिन्हों ने नहीं पाया है अनाज

    तू ही इस मुल्क में नादार नहीं है सो जा
    ऐ मिरे नूर-ए-नज़र लख़्त-ए-जिगर जान-ए-सुकूँ
    नींद आना तुझे दुश्वार नहीं है सो जा
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    ख़्वाब शब की मुंडेरों पे बैठे हुए
    घूरते हैं मुझे
    मेरी आँखों में बसने को बेचैन हैं
    मैं इसी ख़ौफ़ से रात भर
    जागता हूँ कि मैं सो गया गर
    तो ये
    मेरी आँखों में बस जाएँगे
    और कल
    उन की क़ीमत चुकानी पड़ेगी मुझे
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    मैं ने सोचा था कि इस बार तुम्हारी बाहें
    मेरी गर्दन में ब-सद-शौक़ हमाइल होंगी
    मुश्किलें राह-ए-मोहब्बत में न हाइल होंगी

    मैं ने सोचा था कि इस बार निगाहों के सलाम
    आएँगे और ब-अंदाज़-ए-दिगर आएँगे
    फूल ही फूल फ़ज़ाओं में बिखर जाएँगे

    मैं ने सोचा था कि इस बार तुम्हारी साँसें
    मेरी बहकी हुई साँसों से लिपट जाएँगी
    बज़्म-ए-एहसास की तारीकियाँ छट जाएँगी

    मैं ने सोचा था कि इस बार तुम्हारा पैकर
    मेरे बे-ख़्वाब दरीचों को सुला जाएगा
    मेरे कमरे को सलीक़े से सजा जाएगा

    मैं ने सोचा था कि इस बार मिरे आँगन में
    रंग बिखरेंगे उमीदों की धनक टूटेगी
    मेरी तन्हाई के आरिज़ पे शफ़क़ फूटेगी

    मैं ने सोचा था कि इस बार ब-ईं सूरत-ए-हाल
    मेरे दरवाज़े पे शहनाइयाँ सब देखेंगे
    जो कभी पहले नहीं देखा था अब देखेंगे

    मैं ने सोचा था कि इस बार मोहब्बत के लिए
    गुनगुनाते हुए जज़्बों की बरात आएगी
    मुद्दतों ब'अद तमन्नाओं की रात आएगी

    तुम मिरे इश्क़ की तक़दीर बनोगी इस बार
    जीत जाएगा मिरा जोश-ए-जुनूँ सोचा था
    और अब सोच रहा हूँ कि ये क्यूँ सोचा था
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
    लोग बे-वजह उदासी का सबब पूछेंगे
    ये भी पोछेंगे कि तुम इतनी परेशाँ क्यूँ हो
    उँगलियाँ उट्ठेंगी सूखे हुए बालों की तरफ़
    इक नज़र देखेंगे गुज़रे हुए सालों की तरफ़
    चूड़ियों पर भी कई तंज़ किए जाएँगे
    काँपते हाथों पे फ़िक़रे भी कसे जाएँगे
    लोग ज़ालिम हैं हर इक बात का ता'ना देंगे
    बातों बातों में मिरा ज़िक्र भी ले आएँगे
    उन की बातों का ज़रा सा भी असर मत लेना
    वर्ना चेहरे के तअस्सुर से समझ जाएँगे
    चाहे कुछ भी हो सवालात न करना उन से
    मेरे बारे में कोई बात न करना उन से
    बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    अभी से उन के लिए इतनी बे-क़रार न हो
    किया है मुझ को बहुत बे-क़रार छेड़ा है
    तुम्हारे शे'र सुना कर तुम्हारे सर की क़सम
    सहेलियों ने मुझे बार बार छेड़ा है

    कशिश नहीं है तुम्हारे बिना बहारों में
    ये छत ये चाँद सितारे उदास लगते हैं
    चमन का रंग नसीम-ए-सहर गुलाब के फूल
    नहीं हो तुम तो ये सारे उदास लगते हैं

    ख़बर सुनी है कभी जब तुम्हारे आने की
    मैं आइने में दुल्हन बन के मुस्कुराई हूँ
    गई हूँ दामन-ए-दिल को ख़ुशी से भरने मगर
    जहान भर की उदासी समेट लाई हूँ

    कहीं पे गाए गए हैं जो गीत बाबुल के
    तो अजनबी से ख़यालों में खो गई हूँ मैं
    तुम्हारी याद के सीने पे बार-हा 'आज़र'
    तसव्वुरात का सर रख के सो गई हूँ मैं

    तुम्हें यक़ीन न होगा अकेले कमरे में
    मैं अपनी जान से प्यारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ
    तमाम रात तुम्हें याद करती रहती हूँ
    तमाम रात तुम्हारे ख़ुतूत पढ़ती हूँ

    तुम आ भी जाओ कि गुज़रे हुए दिनों की तरह
    सुलग न जाएँ कहीं हसरतों की तस्वीरें
    उदास पा के न छेड़ें सहेलियाँ मुझ को
    बदल भी दो मिरी तन्हाइयों की तक़दीरें
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    हम ने जब कोई भी दरवाज़ा खुला पाया है
    कितनी गुज़री हुई बातों का ख़याल आया है

    क़ाफ़िला दर्द का ठहरेगा कहाँ हम-सफ़रो
    कोई मंज़िल है न बस्ती न कहीं साया है

    एक सहमा हुआ सुनसान गली का नुक्कड़
    शहर की भीड़ में अक्सर मुझे याद आया है

    यूँ लिए फिरता हूँ टूटे हुए ख़्वाबों की सलीब
    अब यही जैसे मिरी ज़ीस्त का सरमाया है

    शहर में एक भी आवारा नहीं अब के बरस
    मौसम-ए-लाला-ओ-गुल कैसी ख़बर लाया है

    उन की टूटी हुई दीवार का साया 'आज़र'
    धूप में क्यूँ मिरे हमराह चला आया है
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    आज मैं ने उसे नज़दीक से जा देखा है
    वो दरीचा तो मिरे क़द से बहुत ऊँचा है

    अपने कमरे को अँधेरों से भरा पाया है
    तेरे बारे में कभी ग़ौर से जब सोचा है

    हर तमन्ना को रिवायत की तरह तोड़ा है
    तब कहीं जा के ज़माना मुझे रास आया है

    तुम को शिकवा है मिरे अहद-ए-मोहब्बत से मगर
    तुम ने पानी पे कोई लफ़्ज़ कभी लिक्खा है

    ऐसा बिछड़ा कि मिला ही नहीं फिर उस का पता
    हाए वो शख़्स जो अक्सर मुझे याद आता है

    कोई उस शख़्स को अपना नहीं कहता 'आज़र'
    अपने घर में भी वो ग़ैरों की तरह रहता है
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    सुकूँ थोड़ा सा पाया धूप के ठंडे मकानों में
    बहुत जलने लगा था जिस्म बर्फ़ीली चटानों में

    कब आओगे ये घर ने मुझ से चलते वक़्त पूछा था
    यही आवाज़ अब तक गूँजती है मेरे कानों में

    जनाज़ा मेरी तन्हाई का ले कर लोग जब निकले
    मैं ख़ुद शामिल था अपनी ज़िंदगी के नौहा-ख़्वानों में

    मिरी महरूमियाँ जब पत्थरों के शहर से गुज़रीं
    छुपाया सर तिरी यादों के टूटे साएबानों में

    मुझे मेरी अना के ख़ंजरों ने क़त्ल कर डाला
    बहाना ये भी इक बेचारगी का था बहानों में

    तमाशा हम भी अपनी बेबसी का देख लेते हैं
    तिरी यादों के फूलों को सजा कर फूलदानों में

    ज़मीं पैरों के छाले रोज़ चुन लेती है पलकों से
    तख़य्युल रोज़ ले उड़ता है मुझ को आसमानों में

    मैं अपने-आप से हर दम ख़फ़ा रहता हूँ यूँ 'आज़र'
    पुरानी दुश्मनी हो जिस तरह दो ख़ानदानों में
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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    उस की आँखों में उतर जाने को जी चाहता है
    शाम होती है तो घर जाने को जी चाहता है

    किसी कम-ज़र्फ़ को बा-ज़र्फ़ अगर कहना पड़े
    ऐसे जीने से तो मर जाने को जी चाहता है

    एक इक बात में सच्चाई है उस की लेकिन
    अपने वा'दों से मुकर जाने को जी चाहता है

    क़र्ज़ टूटे हुए ख़्वाबों का अदा हो जाए
    ज़ात में अपनी बिखर जाने को जी चाहता है

    अपनी पलकों पे सजाए हुए यादों के दिए
    उस की नींदों से गुज़र जाने को जी चाहता है

    एक उजड़े हुए वीरान खंडर में 'आज़र'
    ना-मुनासिब है मगर जाने को जी चाहता है
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    Kafeel Aazar Amrohvi
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Jawayd AnwarJawayd AnwarMahboob KhizanMahboob KhizanJalal LakhnaviJalal LakhnaviSudarshan FakirSudarshan FakirAhmad Nadeem QasmiAhmad Nadeem QasmiAadil Raza MansooriAadil Raza MansooriNadeem BhabhaNadeem BhabhaAkhtar HoshiyarpuriAkhtar HoshiyarpuriLiaqat JafriLiaqat JafriMohammad AlviMohammad Alvi