जो दिल दुखा है तो ये अज़्म भी मिला है हमें
तमाम उम्र किसी का न दिल दुखाएँगे हम
अँधेरी रात को ये मो'जिज़ा दिखाएँगे हम
चराग़ अगर न जला अपना दिल जलाएँगे हम
हमारी कोहकनी के हैं मुख़्तलिफ़ मेयार
पहाड़ काट के रस्ते नए बनाएँगे हम
जुनून-ए-इश्क़ पे तनक़ीद अपना काम नहीं
गुलों को नोच के क्यूँ तितलियाँ उड़ाएँगे हम
जो दिल दुखा है तो ये अज़्म भी मिला है हमें
तमाम उम्र किसी का न दिल दुखाएँगे हम
अगर है मौत में कुछ लुत्फ़ तो बस इतना है
कि इस के बाद ख़ुदा का सुराग़ पाएँगे हम
हमें तो क़ब्र भी तन्हा न कर सकेगी 'नदीम'
कि हर तरफ़ से ज़मीं को क़रीब पाएँगे हम
ख़ुदा करे कि तिरी उम्र में गिने जाएँ
वो दिन जो हम ने तिरे हिज्र में गुज़ारे थे
एहसास में फूल खिल रहे हैं
पतझड़ के अजीब सिलसिले हैं
कुछ इतनी शदीद तीरगी है
आँखों में सितारे तैरते हैं
देखें तो हवा जमी हुई है
सोचें तो दरख़्त झूमते हैं
सुक़रात ने ज़हर पी लिया था
हम ने जीने के दुख सहे हैं
हम तुझ से बिगड़ के जब भी उठे
फिर तेरे हुज़ूर आ गए हैं
हम अक्स हैं एक दूसरे का
चेहरे ये नहीं हैं आइने हैं
लम्हों का ग़ुबार छा रहा है
यादों के चराग़ जल रहे हैं
सूरज ने घने सनोबरों में
जाले से शुआ'ओं के बुने हैं
यकसाँ हैं फ़िराक़-ओ-वस्ल दोनों
ये मरहले एक से कड़े हैं
पा कर भी तो नींद उड़ गई थी
खो कर भी तो रत-जगे मिले हैं
जो दिन तिरी याद में कटे थे
माज़ी के खंडर बने खड़े हैं
जब तेरा जमाल ढूँडते थे
अब तेरा ख़याल ढूँडते हैं
हम दिल के गुदाज़ से हैं मजबूर
जब ख़ुश भी हुए तो रोए हैं
हम ज़िंदा हैं ऐ फ़िराक़ की रात
प्यारी तिरे बाल क्यूँ खुले हैं
जो लोग दुश्मन-ए-जाँ थे वही सहारे थे
मुनाफ़े थे मोहब्बत में ने ख़सारे थे
हुज़ूर-ए-शाह बस इतना ही अर्ज़ करना है
जो इख़्तियार तुम्हारे थे हक़ हमारे थे
ये और बात बहारें गुरेज़-पा निकलीं
गुलों के हम ने तो सदक़े बहुत उतारे थे
ख़ुदा करे कि तिरी उम्र में गिने जाएँ
वो दिन जो हम ने तिरे हिज्र में गुज़ारे थे
अब इज़्न हो तो तिरी ज़ुल्फ़ में पिरो दें फूल
कि आसमाँ के सितारे तो इस्तिआरे थे
क़रीब आए तो हर गुल था ख़ाना-ए-ज़ंबूर
'नदीम' दूर के मंज़र तो प्यारे प्यारे थे
साँस लेना भी सज़ा लगता है
अब तो मरना भी रवा लगता है
कोह-ए-ग़म पर से जो देखूँ तो मुझे
दश्त आग़ोश-ए-फ़ना लगता है
सर-ए-बाज़ार है यारों की तलाश
जो गुज़रता है ख़फ़ा लगता है
मौसम-ए-गुल में सर-ए-शाख़-ए-गुलाब
शो'ला भड़के तो बजा लगता है
मुस्कुराता है जो इस आलम में
ब-ख़ुदा मुझ को ख़ुदा लगता है
इतना मानूस हूँ सन्नाटे से
कोई बोले तो बुरा लगता है
उन से मिल कर भी न काफ़ूर हुआ
दर्द ये सब से जुदा लगता है
नुत्क़ का साथ नहीं देता ज़ेहन
शुक्र करता हूँ गिला लगता है
इस क़दर तुंद है रफ़्तार-ए-हयात
वक़्त भी रिश्ता-बपा लगता है
तुझे खो कर भी तुझे पाऊँ जहाँ तक देखूँ
हुस्न-ए-यज़्दाँ से तुझे हुस्न-ए-बुताँ तक देखूँ
तू ने यूँ देखा है जैसे कभी देखा ही न था
मैं तो दिल में तेरे क़दमों के निशाँ तक देखूँ
सिर्फ़ इस शौक़ में पूछी हैं हज़ारों बातें
मैं तेरा हुस्न तेरे हुस्न-ए-बयाँ तक देखूँ
मेरे वीराना-ए-जाँ में तेरी यादों के तुफ़ैल
फूल खिलते नज़र आते हैं जहाँ तक देखूँ
वक़्त ने ज़ेहन में धुँदला दिए तेरे ख़द-ओ-ख़ाल
यूँ तो मैं टूटते तारों का धुआँ तक देखूँ
दिल गया था तो ये आँखें भी कोई ले जाता
मैं फ़क़त एक ही तस्वीर कहाँ तक देखूँ
इक हक़ीक़त सही फ़िरदौस में हूरों का वजूद
हुस्न-ए-इंसाँ से निमट लूँ तो वहाँ तक देखूँ
जब तिरा हुक्म मिला तर्क मोहब्बत कर दी
दिल मगर इस पे वो धड़का कि क़यामत कर दी
तुझ से किस तरह मैं इज़्हार-ए-तमन्ना करता
लफ़्ज़ सूझा तो मुआ'नी ने बग़ावत कर दी
मैं तो समझा था कि लौट आते हैं जाने वाले
तूने जा कर तो जुदाई मिरी क़िस्मत कर दी
तुझ को पूजा है कि असनाम-परस्ती की है
मैंने वहदत के मफ़ाहीम की कसरत कर दी
मुझ को दुश्मन के इरादों पे भी प्यार आता है
तिरी उल्फ़त ने मोहब्बत मिरी आदत कर दी
पूछ बैठा हूँ मैं तुझ से तिरे कूचे का पता
तेरे हालात ने कैसी तिरी सूरत कर दी
क्या तिरा जिस्म तिरे हुस्न की हिद्दत में जला
राख किसने तिरी सोने की सी रंगत कर दी
कौन कहता है कि मौत आई तो मर जाऊँगा
मैं तो दरिया हूँ समुंदर में उतर जाऊँगा
तेरा दर छोड़ के मैं और किधर जाऊँगा
घर में घिर जाऊँगा सहरा में बिखर जाऊँगा
तेरे पहलू से जो उठ्ठूँगा तो मुश्किल ये है
सिर्फ़ इक शख़्स को पाऊँगा जिधर जाऊँगा
अब तिरे शहर में आऊँगा मुसाफ़िर की तरह
साया-ए-अब्र की मानिंद गुज़र जाऊँगा
तेरा पैमान-ए-वफ़ा राह की दीवार बना
वर्ना सोचा था कि जब चाहूँगा मर जाऊँगा
चारासाज़ों से अलग है मिरा मेआ'र कि मैं
ज़ख़्म खाऊँगा तो कुछ और सँवर जाऊँगा
अब तो ख़ुर्शीद को गुज़रे हुए सदियाँ गुज़रीं
अब उसे ढूँडने मैं ता-ब-सहर जाऊँगा
ज़िंदगी शम्अ' की मानिंद जलाता हूँ 'नदीम'
बुझ तो जाऊँगा मगर सुब्ह तो कर जाऊँगा