ख़्वाब शब की मुंडेरों पे बैठे हुए
घूरते हैं मुझे
मेरी आँखों में बसने को बेचैन हैं
मैं इसी ख़ौफ़ से रात भर
जागता हूँ कि मैं सो गया गर
तो ये
मेरी आँखों में बस जाएँगे
और कल
उन की क़ीमत चुकानी पड़ेगी मुझे
— Kafeel Aazar Amrohvi
घूरते हैं मुझे
मेरी आँखों में बसने को बेचैन हैं
मैं इसी ख़ौफ़ से रात भर
जागता हूँ कि मैं सो गया गर
तो ये
मेरी आँखों में बस जाएँगे
और कल
उन की क़ीमत चुकानी पड़ेगी मुझे
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