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हर्फ़ के तार में जितने आँसू पिरोए गए
दर्द उन से फ़ुज़ूँ था
दर्द उन से फ़ुज़ूँ था
सुनो तो कहूँ
तुम कहो तो कहूँ ज़र्फ़ की दास्ताँ
खेतियों को गिला बादलों से नहीं सूरजों से भी था
बाज़ूओं से भी था हल पकड़ने से पहले ही जो थक गए
किश्त-ए-ज़र-ख़ेज़ पर आब-ए-नमकीन जम सा गया
रक़्स थम सा गया
एड़ियाँ घूमते घूमते रुक गईं
अश्क रुख़्सार की घाटियों से गिरा मुंजमिद हो गया
रंग ख़ुश्बू बना तो हवा चल पड़ी
ख़्वाब नाता बना तो खुली खिड़कियों में सलाख़ें उगीं
हाथ ज़ख़्मी हुए
किस के कश्कोल से कितने सिक्के गिरे
हिज्र कैसा परिंदे की आँखों में था
घाव कैसे पहाड़ों के सीने पे थे
आइना गुंग था
फ़र्श पर अक्स धम से गिरा
किर्चियाँ हो गया
तुम कहो तो गिनूँ
तुम कहो तो चुनूँ
तुम कहो तो सुनूँ इन खुले फूल की धड़कनें
गुम-शुदा तितलियों की सदा
ज़र्द टहनी के होंटों पे रक्खी हुई बद-दुआ'
आसमानों की दहलीज़ पर फेंक दूँ
तुम कहो तो दिखाऊँ तुम्हें
इक तमाशा कि जो मेरी मुट्ठी में है
एक गर्दन कि जो ग़म के फंदे में है
साँस चलती भी है और चलती नहीं
जाँ निकलती नहीं
Read Fullतुम कहो तो कहूँ ज़र्फ़ की दास्ताँ
खेतियों को गिला बादलों से नहीं सूरजों से भी था
बाज़ूओं से भी था हल पकड़ने से पहले ही जो थक गए
किश्त-ए-ज़र-ख़ेज़ पर आब-ए-नमकीन जम सा गया
रक़्स थम सा गया
एड़ियाँ घूमते घूमते रुक गईं
अश्क रुख़्सार की घाटियों से गिरा मुंजमिद हो गया
रंग ख़ुश्बू बना तो हवा चल पड़ी
ख़्वाब नाता बना तो खुली खिड़कियों में सलाख़ें उगीं
हाथ ज़ख़्मी हुए
किस के कश्कोल से कितने सिक्के गिरे
हिज्र कैसा परिंदे की आँखों में था
घाव कैसे पहाड़ों के सीने पे थे
आइना गुंग था
फ़र्श पर अक्स धम से गिरा
किर्चियाँ हो गया
तुम कहो तो गिनूँ
तुम कहो तो चुनूँ
तुम कहो तो सुनूँ इन खुले फूल की धड़कनें
गुम-शुदा तितलियों की सदा
ज़र्द टहनी के होंटों पे रक्खी हुई बद-दुआ'
आसमानों की दहलीज़ पर फेंक दूँ
तुम कहो तो दिखाऊँ तुम्हें
इक तमाशा कि जो मेरी मुट्ठी में है
एक गर्दन कि जो ग़म के फंदे में है
साँस चलती भी है और चलती नहीं
जाँ निकलती नहीं
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हम ख़िज़ाँ की ग़ुदूद से चल कर
ख़ुद दिसम्बर की कोख तक आए
ख़ुद दिसम्बर की कोख तक आए
हम को फ़ुटपाथ पर हयात मिली
हम पतंगों पे लेट कर रोए
सूरजों ने हमारे होंटों पर
अपने होंटों का शहद टपकाया
और हमारी शिकम तसल्ली को
जून की छातियों में दूध आया
बर्फ़ बिस्तर बनी हमारे लिए
और दोज़ख़ के सुर्ख़ रेशम से
हम ने अपने लिए लिहाफ़ बुने
ज़र्द शिरयान को धुएँ से भरा
फेफड़ों पर सियाह राख मली
नागा-साकी में फूल काश्त किए
नज़्म बेरूत में मुकम्मल की
लोरका को कलाई पर बाँधा
हो-ची-मिन्ह को नियाम में रखा
साढ़े लेनिन बजे स्कूल गए
सुब्ह-ए-ईसा को शाम में रक्खा
अरमुग़ान-ए-हिजाज़ में सोए
होलीवुड की अज़ान पर जागे
डाइरी में सुधार था लिखा
दर्द को फ़लसफ़े की लोरी दी
ज़ख़्म पर शाइ'री का फाहा रक्खा
तन मशीनों की थाप पर थिरके
दिल किताबों की ताल पर नाचा
हम ने फ़िरऔन का क़सीदा लिखा
हम ने कूफ़े में मरसिए बेचे
हम ने बोसों का कारोबार किया
हम ने आँखों के आइने बेचे
ज़िंदगी की लगन नहीं हम को
ज़िंदगी की हमें थकन भी नहीं
हम कि हीरो नहीं विलेन भी नहीं
Read Fullहम पतंगों पे लेट कर रोए
सूरजों ने हमारे होंटों पर
अपने होंटों का शहद टपकाया
और हमारी शिकम तसल्ली को
जून की छातियों में दूध आया
बर्फ़ बिस्तर बनी हमारे लिए
और दोज़ख़ के सुर्ख़ रेशम से
हम ने अपने लिए लिहाफ़ बुने
ज़र्द शिरयान को धुएँ से भरा
फेफड़ों पर सियाह राख मली
नागा-साकी में फूल काश्त किए
नज़्म बेरूत में मुकम्मल की
लोरका को कलाई पर बाँधा
हो-ची-मिन्ह को नियाम में रखा
साढ़े लेनिन बजे स्कूल गए
सुब्ह-ए-ईसा को शाम में रक्खा
अरमुग़ान-ए-हिजाज़ में सोए
होलीवुड की अज़ान पर जागे
डाइरी में सुधार था लिखा
दर्द को फ़लसफ़े की लोरी दी
ज़ख़्म पर शाइ'री का फाहा रक्खा
तन मशीनों की थाप पर थिरके
दिल किताबों की ताल पर नाचा
हम ने फ़िरऔन का क़सीदा लिखा
हम ने कूफ़े में मरसिए बेचे
हम ने बोसों का कारोबार किया
हम ने आँखों के आइने बेचे
ज़िंदगी की लगन नहीं हम को
ज़िंदगी की हमें थकन भी नहीं
हम कि हीरो नहीं विलेन भी नहीं
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