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हो गई इश्क़ में बदनाम जवानी अपनी
बन गई मरकज़-ए-आलाम जवानी अपनी
बन गई मरकज़-ए-आलाम जवानी अपनी
माज़ी-ओ-हाल हैं महरूम-ए-शराब-ओ-नग़्मा
हाए अफ़्सुर्दा-ओ-नाकाम जवानी अपनी
आह वो सुब्ह जो थी सुब्ह-ए-बहार-ए-हस्ती
है उसी सुब्ह की अब शाम जवानी अपनी
एक तारीक फ़ज़ा एक घटा सा माहौल
किसी मुफ़्लिस का है अंजाम जवानी अपनी
उन्हीं राहों में उन्हीं मस्त-ओ-जवाँ गलियों में
लड़खड़ाई है बहर-गाम जवानी अपनी
एक वो दिन था कि मय-ख़ानों पे हम भारी थे
आज है दौर-ए-तह-ए-जाम जवानी अपनी
इक्तिफ़ा कर के खनकते हुए रोज़-ओ-शब पर
बन गई ज़ीस्त पर इल्ज़ाम जवानी अपनी
दिन हुआ धूप चढ़ी ढल गए साए 'अलताफ़'
अब है इक बुझती हुई शाम जवानी अपनी
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ज़िंदगी दर्द से क़रीब रहे
ग़म की दौलत मुझे नसीब रहे
ग़म की दौलत मुझे नसीब रहे
मौसम ऐसा भी हो कोई सय्याद
बाग़ जब वक़्फ़-ए-अंदलीब रहे
मुस्कुरा दो किसी की मय्यत पर
मौत क्यूँ तीरा-ओ-मुहीब रहे
वस्ल को वस्ल जानने के लिए
ज़ीनत-ए-बज़्म इक रक़ीब रहे
जान का खेल खेलने वालो
इम्तिहाँ को दर-ए-हबीब रहे
जाग कर मैं ने काट दीं रातें
नींद में गुम मगर नसीब रहे
किस ने 'अलताफ़' दी दुआ मुझ को
दर्द से ज़िंदगी क़रीब रहे
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लेटा हुआ हूँ साया-ए-ग़ुर्बत में घर से दूर
दिल से क़रीं हैं अहल-ए-वतन और नज़र से दूर
दिल से क़रीं हैं अहल-ए-वतन और नज़र से दूर
जब तक है दिल रहीन-ए-मआल-ओ-असीर-ए-अक़्ल
रहना है तुझ से और तिरी रहगुज़र से दूर
ऐ कैफ़ उन की मस्त निगाहों में छुप के आ
ऐ दर्द-ए-दम ज़दन में हो मेरे जिगर से दूर
इक दिन उलटने वाली है ज़ाहिद बिसात-ए-ज़ोहद
कब तक रहेगा दिल निगह-ए-फ़ित्ना-गर से दूर
वो कोई ज़िंदगी है जवानी है वो कोई
ऐ दोस्त जो है तेरे जमाल-ए-नज़र से दूर
क्या आई तेरे जी में कि तक़दीर यूँ मुझे
फेंका है ला के वादी-ए-ग़ुर्बत में घर से दूर
ऐ हुस्न-ए-बे-पनाह बताए कोई मुझे
दुनिया की कौन चीज़ है तेरे असर से दूर
अल्लाह रे नसीब कि पाई है वो फ़ुग़ाँ
जो उम्र भर रही है फ़रेब-ए-असर से दूर
'अलताफ़' नाज़ अपनी गदाई पे है मुझे
दामन है उस का साया-ए-लाल-ओ-गुहरस दूर
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नज़ाकत मोहब्बत का ग़म खा रही है
मोहब्बत मोहब्बत हुई जा रही है
मोहब्बत मोहब्बत हुई जा रही है
तुम्हारी नज़र के हसीं मय-कदों में
उरूस-ए-ख़राबात इठला रही है
नज़र क्या लड़ी एक ख़ंदाँ नज़र से
जवानी तबस्सुम बनी जा रही है
तसव्वुर के हाथों में दे कर खिलौने
जवानी मोहब्बत को बहला रही है
ये क्या बात है अजनबी अँखड़ियों से
कोई जानी-बूझी सदा आ रही है
न फूलों की रुत है न कलियों का मौसम
मगर बुलबुल-ए-बे-नवा गा रही है
ये 'अलताफ़' कौन आ गया वक़्त-ए-आख़िर
क़ज़ा नर्म-ओ-शीरीं हुई जा रही है
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आह दुनिया सरा-ए-फ़ानी है
किस क़दर मुख़्तसर कहानी है
किस क़दर मुख़्तसर कहानी है
ख़ुद को देता हूँ मुस्कुरा के फ़रेब
दिल मगर वक़्फ़-ए-नौहा-ख़्वानी है
मुझ से हंस-बोल लें मिरे साथी
अब कोई दिन की ज़िंदगानी है
मौसम-ए-गुल में वो जो आन मिलें
हम भी जानें कि रुत सुहानी है
बे-सबब तो नहीं बहे आँसू
आँसू आँसू में इक कहानी है
इक सरापा कि रंज-ओ-यास हैं हम
दर्द-ए-दिल मोनिस-ए-जवानी है
मुस्कुराऊँ मैं किस तरह 'अलताफ़'
ताक में दौर-ए-आसमानी है
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