अक़्ल ने हम को यूँ भटकाया रह न सके दीवाने भी
आबादी को ढूँडने निकले खो बैठे वीराने भी
चश्म-ए-साक़ी भी नम है लौ देते हैं पैमाने भी
तिश्ना-लबी के सैल-ए-तपाँ से बच न सके मयख़ाने भी
संग-ए-जफ़ा को ख़ुश-ख़बरी दो मुज़्दा दो ज़ंजीरों को
शहर-ए-ख़िरद में आ पहुँचे हैं हम जैसे दीवाने भी
हम ने जब जिस दोस्त को भी आईना दिखाया माज़ी का
हैराँ हो कर अक्स ने पूछा आप मुझे पहचाने भी
जिस्म की तिश्ना-सामानी से जिस्म ही ना-आसूदा नहीं
टूट गए इस ज़द पर आ कर रूह के ताने-बाने भी
अंदेशे और बज़्म-ए-जानाँ दार का ज़िक्र और इतना सुकूत
दीवानों के भेस में शायद आ पहुँचे फ़रज़ाने भी
ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या
आईना और इस क़दर अंधा भी क्या
उस को देखा भी मगर देखा भी क्या
अर्सा-ए-ख़्वाहिश में इक लम्हा भी क्या
दर्द का रिश्ता भी है तुझ से बहुत
और फिर ये दर्द का रिश्ता भी किया
ज़िंदगी ख़ुद लाख ज़हरों का थी ज़हर
ज़हर-ए-ग़म तुझ से मिरा होता भी क्या
पूछता है राह-रौ से ये सराब
तिश्नगी का नाम है दरिया भी क्या
खींचती है अक़्ल जब कोई हिसार
धूप कहती है कि ये साया भी क्या
उफ़ ये लौ देती हुई तन्हाइयाँ
शहर में आबाद है सहरा भी क्या
ख़ुद उसे दरकार थी मेरी नज़र
ख़ुद-नुमा जल्वा मुझे देता भी क्या
रक़्स करना हर नए झोंके के साथ
बर्ग-ए-आवारा है ये दुनिया भी क्या
ख़ंदा-ज़न ग़म पर ख़ुशी पर अश्क-बार
इन दिनों यारो है रंग अपना भी क्या
बे-तब-ओ-ताब-ए-शुआ-ए-आगही
इश्क़ कहिए जिस को वो शोला भी क्या
गाहे गाहे प्यार की भी इक नज़र
हम से रूठे ही रहो ऐसा भी क्या
ऐ मिरी तख़्लीक़-ए-फ़न तेरे बग़ैर
मैं कि सब कुछ था मगर मैं था भी क्या
नग़्मा-ए-जाँ को गिराँ-गोशों के पास
ना-रसाई के सिवा मिलता भी क्या
वो ख़्वाब ही सही पेश-ए-नज़र तो अब भी है
बिछड़ने वाला शरीक-ए-सफ़र तो अब भी है
ज़बाँ बुरीदा सही मैं ख़िज़ाँ-गज़ीदा सही
हरा-भरा मिरा ज़ख़्म-ए-हुनर तो अब भी है
सुना था हम ने कि मौसम बदल गए हैं मगर
ज़मीं से फ़ासला-ए-अब्र-ए-तर तो अब भी है
हमारी दर-बदरी पर न जाइए कि हमें
शुऊर-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर तो अब भी है
हवस के दौर में मम्नून-ए-याद-ए-यार हैं हम
कि याद-ए-यार दिलों की सिपर तो अब भी है
कहानियाँ हैं अगर मो'तबर तो फिर इक शख़्स
कहानियों की तरह मो'तबर तो अब भी है
हज़ार खींच ले सूरज हिसार-ए-अब्र मगर
किरन किरन पे गिरफ़्त-ए-नज़र तो अब भी है
समुंदरों से ज़मीनों को ख़ौफ़ क्या कि उमीद
नुमू-पज़ीर ज़मीन-ए-हुनर तो अब भी है
मगर ये कौन बदलती हुई रुतों से कहे
शजर में साया नहीं है शजर तो अब भी है
इक ऐसा मरहला-ए-रह-गुज़र भी आता है
कोई फ़सील-ए-अना से उतर भी आता है
तिरी तलाश में जाने कहाँ भटक जाऊँ
सफ़र में दश्त भी आता है घर भी आता है
तलाश साए की लाई जो दश्त से तो खुला
अज़ाब-ए-सूरत-ए-दीवार-ओ-दर भी आता है
सकूँ तो जब हो कि मैं छाँव सेहन में देखूँ
नज़र तो वैसे गली का शजर भी आता है
बदन की ख़ाक समेटे हुए हो क्या लोगो
सफ़र में लम्हा-ए-तर्क-ए-सफ़र भी आता है
दिलों को ज़ख़्म न दो हर्फ़-ए-ना-मुलाएम से
ये तीर वो है कि जो लौट कर भी आता है
मैं शहर में किसे इल्ज़ाम-ए-ना-शनासी दूँ
ये हर्फ़ ख़ुद मिरे किरदार पर भी आता है
नज़र ये किस से मिली ना-गहाँ कि याद आया
इसी गली में कहीं मेरा घर भी आता है
हवा के रुख़ पे नज़र ताइरान-ए-ख़ुश-परवाज़
क़फ़स का साया पस-ए-बाल-ओ-पर भी आता है
मैं हर्फ़ हर्फ़ में उतरा हूँ रौशनी की तरह
सो काएनात का चेहरा नज़र भी आता है
लहू से हर्फ़ तराशें जो मेरी तरह उम्मीद
उन्हीं के हिस्से में ज़ख़्म-ए-हुनर भी आता है
नाज़ कर नाज़ कि ये नाज़ जुदा है सब से
मेरा लहजा मिरी आवाज़ जुदा है सब से
जुज़ मोहब्बत किसे मालूम कि वो चश्म-ए-हया
बात तो करती है अंदाज़ जुदा है सब से
जिस को भी मार दिया ज़िंदा-ए-जावेद किया
हर्फ़-ए-हक़ तेरा ये ए'जाज़ जुदा है सब से
देखना कौन है क्या उस को नहीं जान-ए-अज़ीज़
सर-ए-दरबार इक आवाज़ जुदा है सब से
टूट जाता है तो सुर और भी लौ देते हैं
दिल जिसे कहते हैं वो साज़ जुदा है सब से
सोच कर दाम बिछाना ज़रा ऐ मौज-ए-हवा
मेरे इंकार की परवाज़ जुदा है सब से
नश्शा-ए-दहर-ओ-क़यामत का तो क्या ज़िक्र 'उमीद'
वो मिरा सर्व-ए-सर-अफ़राज़ जुदा है सब से
कब तक इस प्यास के सहरा में झुलसते जाएँ
अब ये बादल जो उठे हैं तो बरसते जाएँ
कौन बतलाए तुम्हें कैसे वो मौसम हैं कि जो
मुझ से ही दूर रहें मुझ में ही बस्ते जाएँ
हम से आज़ाद-मिज़ाजों पे ये उफ़्ताद है क्या
चाहते जाएँ उसे ख़ुद को तरसते जाएँ
हाए क्या लोग ये आबाद हुए हैं मुझ में
प्यार के लफ़्ज़ लिखें लहजे से डसते जाएँ
आइना देखूँ तो इक चेहरे के बे-रंग नुक़ूश
एक नादीदा सी ज़ंजीर में कसते जाएँ
जुज़ मोहब्बत किसे आया है मयस्सर 'उम्मीद'
ऐसा लम्हा कि जिधर सदियों के रस्ते जाएँ
जाने ये कैसा ज़हर दिलों में उतर गया
परछाईं ज़िंदा रह गई इंसान मर गया
बर्बादियाँ तो मेरा मुक़द्दर ही थीं मगर
चेहरों से दोस्तों के मुलम्मा उतर गया
ऐ दोपहर की धूप बता क्या जवाब दूँ
दीवार पूछती है कि साया किधर गया
इस शहर में फ़राश-तलब है हर एक राह
वो ख़ुश-नसीब था जो सलीक़े से मर गया
क्या क्या न उस को ज़ोम-ए-मसीहाई था 'उमीद'
हम ने दिखाए ज़ख़्म तो चेहरा उतर गया
हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं
याद आने की तरह याद वो आया भी नहीं
जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब
सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं
वज्ह-ए-रुस्वाई-ए-एहसास हुआ है क्या क्या
हाए वो लफ़्ज़ जो लब तक मिरे आया भी नहीं
ऐ मोहब्बत ये सितम क्या कि जुदा हूँ ख़ुद से
कोई ऐसा मिरे नज़दीक तो आया भी नहीं
या हमें ज़ुल्फ़ के साए ही में नींद आती थी
या मयस्सर किसी दीवार का साया भी नहीं
बार-हा दिल तिरी क़ुर्बत से धड़क उट्ठा है
गो अभी वक़्त मोहब्बत में वो आया भी नहीं
आप उस शख़्स को क्या कहिए कि जिस ने 'उम्मीद'
ग़म दिया ग़म को दिल-आज़ार बनाया भी नहीं
मक़्तल-ए-जाँ से कि ज़िंदाँ से कि घर से निकले
हम तो ख़ुशबू की तरह निकले जिधर से निकले
गर क़यामत ये नहीं है तो क़यामत क्या है
शहर जलता रहा और लोग न घर से निकले
जाने वो कौन सी मंज़िल थी मोहब्बत की जहाँ
मेरे आँसू भी तिरे दीदा-ए-तर से निकले
दर-ब-दरी का हमें तअना न दे ऐ चश्म-ए-ग़ज़ाल
देख वो ख़्वाब कि जिस के लिए घर से निकले
मेरा रहज़न हुआ क्या क्या न पशेमान कि जब
इस के नामे मेरे असबाब-ए-सफ़र से निकले
बर-सर-ए-दोश रहे या सर-ए-नेज़ा या-रब
हक़-परस्ती का न सौदा कभी सर से निकले