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ऐ दिल-ए-ख़ुद-ना-शनास ऐसा भी क्या
आईना और इस क़दर अंधा भी क्या
आईना और इस क़दर अंधा भी क्या
उस को देखा भी मगर देखा भी क्या
अर्सा-ए-ख़्वाहिश में इक लम्हा भी क्या
दर्द का रिश्ता भी है तुझ से बहुत
और फिर ये दर्द का रिश्ता भी किया
ज़िंदगी ख़ुद लाख ज़हरों का थी ज़हर
ज़हर-ए-ग़म तुझ से मिरा होता भी क्या
पूछता है राह-रौ से ये सराब
तिश्नगी का नाम है दरिया भी क्या
खींचती है अक़्ल जब कोई हिसार
धूप कहती है कि ये साया भी क्या
उफ़ ये लौ देती हुई तन्हाइयाँ
शहर में आबाद है सहरा भी क्या
ख़ुद उसे दरकार थी मेरी नज़र
ख़ुद-नुमा जल्वा मुझे देता भी क्या
रक़्स करना हर नए झोंके के साथ
बर्ग-ए-आवारा है ये दुनिया भी क्या
ख़ंदा-ज़न ग़म पर ख़ुशी पर अश्क-बार
इन दिनों यारो है रंग अपना भी क्या
बे-तब-ओ-ताब-ए-शुआ-ए-आगही इश्क़ कहिए जिस को वो शो'ला भी क्या
गाहे गाहे प्यार की भी इक नज़र
हम से रूठे ही रहो ऐसा भी क्या
ऐ मिरी तख़्लीक़-ए-फ़न तेरे बग़ैर
मैं कि सब कुछ था मगर मैं था भी क्या
नग़्मा-ए-जाँ को गिराँ-गोशों के पास
ना-रसाई के सिवा मिलता भी क्या
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नाज़ कर नाज़ कि ये नाज़ जुदा है सब से
मेरा लहजा मिरी आवाज़ जुदा है सब से
मेरा लहजा मिरी आवाज़ जुदा है सब से
जुज़ मोहब्बत किसे मालूम कि वो चश्म-ए-हया
बात तो करती है अंदाज़ जुदा है सब से
जिस को भी मार दिया ज़िंदा-ए-जावेद किया
हर्फ़-ए-हक़ तेरा ये ए'जाज़ जुदा है सब से
देखना कौन है क्या उस को नहीं जान-ए-अज़ीज़
सर-ए-दरबार इक आवाज़ जुदा है सब से
टूट जाता है तो सुर और भी लौ देते हैं
दिल जिसे कहते हैं वो साज़ जुदा है सब से
सोच कर दाम बिछाना ज़रा ऐ मौज-ए-हवा
मेरे इनकार की परवाज़ जुदा है सब से
नश्शा-ए-दहर-ओ-क़यामत का तो क्या ज़िक्र 'उमीद'
वो मिरा सर्व-ए-सर-अफ़राज़ जुदा है सब से
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हाए इक शख़्स जिसे हम ने भुलाया भी नहीं
याद आने की तरह याद वो आया भी नहीं
याद आने की तरह याद वो आया भी नहीं
जाने किस मोड़ पे ले आई हमें तेरी तलब
सर पे सूरज भी नहीं राह में साया भी नहीं
वज्ह-ए-रुस्वाई-ए-एहसास हुआ है क्या क्या
हाए वो लफ़्ज़ जो लब तक मिरे आया भी नहीं
ऐ मोहब्बत ये सितम क्या कि जुदा हूँ ख़ुद से
कोई ऐसा मिरे नज़दीक तो आया भी नहीं
या हमें ज़ुल्फ़ के साए ही में नींद आती थी
या मुयस्सर किसी दीवार का साया भी नहीं
बार-हा दिल तिरी क़ुर्बत से धड़क उट्ठा है
गो अभी वक़्त मोहब्बत में वो आया भी नहीं
आप उस शख़्स को क्या कहिए कि जिस ने 'उम्मीद'
ग़म दिया ग़म को दिल-आज़ार बनाया भी नहीं
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