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तू कोई ग़म है तो दिल में जगह बना अपनी
तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल
तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल
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सियाह-ख़ाना-ए-उम्मीद-ए-राएगाँ से निकल
खुली फ़ज़ा में ज़रा आ ग़ुबार-ए-जाँ से निकल
खुली फ़ज़ा में ज़रा आ ग़ुबार-ए-जाँ से निकल
अजीब भीड़ यहाँ जम्अ' है यहाँ से निकल
कहीं भी चल मगर इस शहर-ए-बे-अमाँ से निकल
इक और राह उधर देख जा रही है वहीं
ये लोग आते रहेंगे तू दरमियाँ से निकल
ज़रा बढ़ा तो सही वाक़िआत को आगे
तिलिस्म-कारी-ए-आग़ाज़-ए-दास्ताँ से निकल
तू कोई ग़म है तो दिल में जगह बना अपनी
तू इक सदा है तो एहसास की कमाँ से निकल
यहीं कहीं तेरा दुश्मन छुपा है ऐ 'बानी'
कोई बहाना बना बज़्म-ए-दोस्ताँ से निकल
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न मंज़िलें थीं न कुछ दिल में था न सर में था
अजब नज़ारा-ए-ला-सम्तियत नज़र में था
अजब नज़ारा-ए-ला-सम्तियत नज़र में था
इताब था किसी लम्हे का इक ज़माने पर
किसी को चैन न बाहर था और न घर में था
छुपा के ले गया दुनिया से अपने दिल के घाव
कि एक शख़्स बहुत ताक़ इस हुनर में था
किसी के लौटने की जब सदा सुनी तो खुला
कि मेरे साथ कोई और भी सफ़र में था
कभी मैं आब के तामीर-कर्दा क़स्र में हूँ
कभी हवा में बनाए हुए से घर में था
झिजक रहा था वो कहने से कोई बात ऐसी
मैं चुप खड़ा था कि सब कुछ मेरी नज़र में था
यही समझ के उसे ख़ुद सदा न दी मैं ने
वो तेज़-गाम किसी दूर के सफ़र में था
कभी हूँ तेरी ख़मोशी के कटते साहिल पर
कभी मैं लौटती आवाज़ के भँवर में था
हमारी आँख में आ कर बना इक अश्क वो रंग
जो बर्ग-ए-सब्ज़ के अंदर न शाख़-ए-तर में था
कोई भी घर में समझता न था मेरे दुख सुख
एक अजनबी की तरह मैं ख़ुद अपने घर में था
अभी न बरसे थे 'बानी' घिरे हुए बादल
मैं उड़ती ख़ाक की मानिंद रहगुज़र में था
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