वफ़ा का मिरी क्या सिला दीजिएगा
ग़म-ए-दिल की लज़्ज़त बढ़ा दीजिएगा
मुझे देख कर मुस्कुरा दीजिएगा
यूँही मेरी हस्ती मिटा दीजिएगा
सिला दिल लगाने का क्या दीजिएगा
सितम दीजिएगा सज़ा दीजिएगा
सुकूँ की तलब मुझ को हरगिज़ नहीं है
बस इक दर्द का सिलसिला दीजिएगा
ख़ुशी बाँटने के नहीं आप क़ाइल
तो ग़म ही मुझे कुछ सिवा दीजिएगा
मुझे क्या ख़बर थी कि ख़ुद लौह-ए-दिल पर
मिरा नाम लिख कर मिटा दीजिएगा
सुकून क़ल्ब को जिस से मिल जाए 'ताबाँ'
ग़ज़ल कोई ऐसी सुना दीजिएगा
बहार बन के मिरे हर नफ़स पे छाई हो
अजब अदा से मिरी ज़िंदगी में आई हो
तुम्हारा हुस्न वो तस्वीर-ए-हुस्न-ए-कामिल है
ख़ुदा ने ख़ास ही लम्हों में जो बनाई हो
शराब है न सहर है मगर ये आलम है
किसी ने जैसे निगाहों से मय पिलाई हो
तिरी तरह ही गुरेज़ाँ है नींद भी मुझ से
क़सम है तेरी जो अब तक क़रीब आई हो
तू उस निगाह से पी वक़्त-ए-मय-कशी 'ताबाँ'
की जिस निगाह पे क़ुर्बान पारसाई हो
ख़ुशी की बात और है ग़मों की बात और
तुम्हारी बात और है हमारी बात और
कोई अगर जफ़ा करे नहीं है कुछ गिला मुझे
किसी की बात और है तुम्हारी बात और
हुज़ूर सुन भी लीजिए छोड़ कर के जाइए
ज़रा सी बात और है ज़रा सी बात और
क़ितआ रुबाई और नज़्म ख़ूब-तर सहीह मगर
ग़ज़ल की बात और है ग़ज़ल की बात और
ज़बाँ से 'ताबाँ' मत कहो नज़र से इल्तिजा करो
ज़बाँ की बात और है नज़र की बात और