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ज़िंदगी-भर एक ही कार-ए-हुनर करते रहे
इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे
इक घरौंदा रेत का था जिस को घर करते रहे
हम को भी मा'लूम था अंजाम क्या होगा मगर
शहर-ए-कूफ़ा की तरफ़ हम भी सफ़र करते रहे
उड़ गए सारे परिंदे मौसमों की चाह में
इंतिज़ार उन का मगर बूढे शजर करते रहे
यूँ तो हम भी कौन सा ज़िंदा रहे इस शहर में
ज़िंदा होने की अदाकारी मगर करते रहे
आँख रह तकती रही दिल उस को समझाता रहा
अपना अपना काम दोनों उम्र-भर करते रहे
इक नहीं का ख़ौफ़ था सो हम ने पूछा ही नहीं
याद क्या हम को भी वो दीवार-ओ-दर करते रहे
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ध्यान में आ कर बैठ गए हो तुम भी ना
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना
मुझे मुसलसल देख रहे हो तुम भी ना
दे जाते हो मुझ को कितने रंग नए
जैसे पहली बार मिले हो तुम भी ना
हर मंज़र में अब हम दोनों होते हैं
मुझ में ऐसे आन बसे हो तुम भी ना
इश्क़ ने यूँ दोनों को आमेज़ किया
अब तो तुम भी कह देते हो तुम भी ना
ख़ुद ही कहो अब कैसे सँवर सकती हूँ मैं
आईने में तुम होते हो तुम भी ना
बन के हँसी होंटों पर भी रहते हो
अश्कों में भी तुम बहते हो तुम भी ना
मेरी बंद आँखें तुम पढ़ लेते हो
मुझ को इतना जान चुके हो तुम भी ना
माँग रहे हो रुख़्सत और अब ख़ुद ही
हाथ में हाथ लिए बैठे हो तुम भी ना
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